साजन थारै भाग में, म्हारी प्रीत री रेख।

लिखतो आयो सायबो, युग-युग सूं लेख॥

नी छूटै तो मा सूं, दुनिया बेरी होय।

लाख धोयलो कस्तुरी, कोनी धोळी होय॥

चांदो चमकै आभै, लहरां हिल-बिल होय।

नदिया जावै दौड़ती, सगर सागै सोय॥

दीप जळै महलां में, दौड़ पतंगो आवै।

प्रीतड़ली रै कारणै, बळतो-जळतो जावै॥

भंवरो छेदै काठ नै, इतरो इण में जोस।

कंवळ पांखड़ी फसियो, भूल्यो सारो होस॥

चांदी म्हारी प्रीतड़ी, रंग लागै, जंग।

जहर चढ़ै चंदन, लिपटै लाख भुजंग॥

नेह उडीकै आंखियां, साजणियो चहूं ओर।

कोडिलो तो जाग रयो, किण हिवड़ै री कोर॥

इक दिन तो घर आवसी, मथुरा रो घनश्याम।

राधा जोवै बाटड़ी, खड़ी दुवारका धाम॥

साजण थारै भाग में, म्हारी प्रीत री रेख।

लिखतो आयो सायबो, युग-युग सूं लेख॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : मदनमोहन पड़िहार ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 15
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