भासा मायड़ भूलगा, करता सासण काज।

भज स्वारथ घोड़ी बणै, इसड़ा नेता आज॥

वोटां खातर बैच दै, रीत प्रीत सनमान।

के आं सूं आसा करां, मायड़ हंदै मान॥

राजस्थानी बोलता, फिर फिर मांगे बोट।

इबतौ भायां ओळखो, खरी काळजै खोट॥

रहणौ राजस्थान में, सूंत कमाई सांन।

राजस्थानी रौ अबै, करणौ पड़सी मांन॥

इबतौ हुयगा आखता, बातां सुण बेतंत।

पनरा क्रोड पिछांणली, कुण आपां रौ कंत॥

बेटा लखणा बायरा, धेटा हुयगा धाप।

मन में रोती मावड़ी, सहन करै संताप॥

जूनौ अेक हजार जग, आछोड़ौ इतिहास।

बिन भासा रा ना बिजु, लाखूं जीवत ल्हास॥

गाभा रोटी गेहरौ, सब नै लागो सौच।

भासा हंदी भावना, मन में पड़ियो मोच॥

कभी जिनस री ना कदै, आपां रै ही आज।

पांती खोसी आपणी पूरबियां री पाज॥

मायड़ भासा मान री, जण जण जोत जगाव।

सबकै कारज सूधरै सगळां रौ हिक साव॥

वोट चोट करियां बिना, नेता पूछै नांय।

आं सूं करलो आमनौ, गप गैलै घल जाए॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : लक्ष्मणदान कविया ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशक पिलानी (राज.) ,
  • संस्करण : 23
जुड़्योड़ा विसै