रामाइण ही राम, कीयउ जे हूँती कन्हइ।

सकति विहूणउ स्याम, विढण होयइ वीसहथि॥

भावार्थ :- कवि देवी की वंदना करते हुए कहता है कि, 'हे देवी! राम ने रावण से जो भीषण युद्ध किया और जिसमें वे विजयी हुए, वह इसीलिए क्योंकि उसमें तुम उनके समीप थीं और उनकी पृष्ठपोषक (सहायक) थीं।' अर्थात् तुम्हारी ही सहायता से राम ने उस दुर्धर्ष संग्राम में रावण पर विजय पाई। हे बीस भुजाओं वाली! शक्ति से रहित श्याम (राम) युद्ध में सफल नहीं हो सकते थे। अर्थात् हे महाशक्ति! तुम्हारे ही सानिध्य से राम युद्ध में रावण को पराभूत कर सके थे।

स्रोत
  • पोथी : अचलदास खिची री वचनिका ,
  • सिरजक : शिवदास गाडण ,
  • संपादक : शम्भूसिंह मनोहर ,
  • प्रकाशक : राजस्थान प्राच्यविधा प्रतिष्ठान, जोधपुर
जुड़्योड़ा विसै