अमर जङी पांनै पड़ी, सो सूंघी संत जणि।

‘बखना’ विसहर सूं लड़ै, न्योल जड़ी के पांणि॥

स्रोत
  • पोथी : बखना जी की वाणी ,
  • सिरजक : बखना जी ,
  • संपादक : मंगलदास स्वामी ,
  • प्रकाशक : लक्ष्मीराम ट्रस्ट, जयपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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