कलम कठण तलवार स्यूं, अेड़ी मारै मार।

अंटाचित व्है आगलो, काढै़ सारो खार॥

कलम बेचकर जो लिखै, बो पापी कूजात।

धरम भिष्ट नैं देखणो, बडो पाप है भ्रात॥

गीता रचदी कलमड़ी, कलम रची रमाण।

म्हाभारत ईं स्यूं रची, वेदव्यास परमाण॥

कलम बिखेरै च्यानणो, खोलै हिवड़ै पाट।

दग्गड़ समदां तिरै, सुधरै सम्पटपाट॥

सुरसत री या लाडली, धरी विनायक हाथ।

विघन-हरण या कलमड़ी, भू-मण्डल कै माथ॥

बालमिक री बायली गोसांई री भांण।

शेक्सपियर री मात या, और घणां-ई जाण॥

अणथाग समंदर सूर, मीरां नैणां नीर।

कबीर लाडलो तेरो जाणां, दादू भी गंभीर॥

सुन्दर तेरो दास है, तुळसी तेरो दास।

रोणो तेरै साथ है, हंसणो भी है खास॥

ग्यान-गंग नै दूहियो, जय हो रहीम खान।

खीर-समंदर खाय कर, ऊभा सी रसखान॥

सुरसत हाथां राचणी, मैंदी खूब सरूप।

अम्बर में डम्बर फट्यो, ढोलै रै अनुरूप॥

कलम धरम नैं भूलकर, मत बण मौत हराम।

फांसी चढ़तो आदमी, तनैं करै परणाम॥

मून धार क्यूं बैठगी, छोड़ लोक की लाज।

बळै तंदूरां गोरड़ी, देख कलमड़ी आज॥

लुच्चा, लोफ़र, दोगला, तसकर, चोर डकैत।

धन-पिशाच री भायली, करै तख़त-संकेत॥

टूट भलांईं कलमड़ी, लुळियै मतनां भांण।

तीखी राखी धार तूं, राखी खुद री आंण॥

कांटो कांटै स्यूं कढै़, कलम कलम की काट।

दरद मिटावै दीन को, कलम उठाया ठाठ॥

कलम कुजीवां हाथ में, मत खोवै मरजाद।

ठूंठा नैं मत तूठिये, काढ़ बारणै जात॥

कलम, सबद दे पीड़ नैं, जगत पीड़ बण जाय।

डरज्या कुबदी बांदरा, नीड़ पंखेरू पाय॥

कलम बंट्येड़ी कलम में, कलम कलम की राड़।

कठै अमूरत कलमड़ी, ठाडी पटक-पछाड़॥

कलम बंटेड़ी दीठ में, कलम कलम की क्लास।

कलम आम की पक्षधर, कलम खास की खास॥

कलम काळजो काढ़ले, कलम बचावै प्राण।

मेळ करावै कलमड़ी, रचवा दे घमसाण॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : केसरीकान्त शर्मा ‘केसरी’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक–18
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