च्यारि बोल आपी करी, भोगवि लाछि अणंत।

‘मोल्हउ’ कहइ राजा निसुणि, कीरति दुहेली हुंति॥

‘मोल्हउ’ कहइ बिसहर करिसि, जइ इन नामिसि नाक।

सरणाई आपिसि नहीं, कीरति होसी नाक॥

कीरती मोल्हा! वरिजि मइं, लाछी तुं ले जाह।

डाभ अग्नि जे ऊपड़इ, ते आपउं पतिसाह॥

जइं हारउं तउ हरि सरणि, जइ जीपउं तउ डाउ।

राउ कहइ बारहट! निसुणि, बिहुं परि मोनइ लाह॥

भाट कहइ भोळउ किसउ, तूं भूलउ सुरिताण।

गढ रणथंभ हमीरदे, जीपिसि किणिहि विनाणि॥

स्रोत
  • पोथी : हम्मीरायण ,
  • सिरजक : भांडउ व्यास ,
  • संपादक : भंवरलाल नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
जुड़्योड़ा विसै