डोर बांधी प्रीत री, लागै डर इब नांय।

परेम सागर सामनै, भरां भरोसो मांय॥

जुलम ज्यादती देख नर, साधै जैको मून।

दोसी सबसूं बो बड़ो, सदा बापरै सून॥

मैतब घटियो परब रो, मिनख मिनख सूं दूर।

निठगो भेळां बैठणो, हुग्या मद में चूर॥

धोरां आळै देस में, सुगन सुहाणी आय।

बंतळ करै मिनख जद, मायड़ बोल सुहाय॥

कबू, कमेड़ी, कागला, दिन-दिन कमती होय।

बदळी परकत भायला, घणो मता तूं सोय॥

मिनख हुवै तो मिनख सो, दिखणो भी जरूर।

यूं तो धरा भरी पड़ी, दुपायां सूं हजूर॥

घुमै घिरणां छानै छिदि, ल्हुकती फिरै प्रीत।

पढिया लिखिया मिनख भी, बणगा सगळा भींत॥

जस मिलै ना जतन बिना, विगास रो मूळ।

पतन करै नीयत बुरी, सोक्यूं होज्या धूळ॥

टोक्या करता गळत नै, कठै गया बै लोग।

खोवै आपो मिनखड़ो, लाग्यो कांई रोग॥

परेम पथ पै चालणो, सोरो कोनी मीत।

रोड़ा है ईं राह में, मिलसी मुसकल जीत॥

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : लियाकत ‘भावुक’ ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी ,
  • संस्करण : अंक-44
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