ओंकार आकार, रहित अविगति अपरम्पर।

अलख अजोनी सभ, सृष्टिकरता विश्वम्भर।

घट घट अंतर वसइ, तासु चीन्हइ नहिं कोई।

जल थलि सुरगि पयालि, जिहां देखो तिहं सोई।

जोगिंद सिद्ध मुनिवर जिके, प्रबल महातप सद्धयौ।

छीहल्ल कहइ अस पुरुष कौ, किण ही अंत लद्धयौ॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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