मृग वन मंज्झि चरंति, डरिउ पारधी पिक्खि तिहि।
जब पाछिउ पुनि चल्यो, वधिक रोपियउ फंद तिहि।
दिसि दाहिणी सुं स्वान, सिंह ज्युं सनमुख धावै।
वाम अगिनि परजलिय, तासु भय जाण न पावै।
छीहल्ल गमण चहुं दिसि नहीं, चित चिंता चिंतउ हरण।
हा हा देव संकट परयौ, तुझ बिन अवर न की सरण॥