लिखा तणइ परमाणि, राम लख्खण बनवासी।

सीय निसाचर हरी, भई द्रोपदि पुनि दासी।

कुंती सुन वैराट गेह, सेवक होइ रहिया।

नीर भर्‌यौ हरिचंद, पर घर बहु दुख सहिया।

आपदा पड़ी परिग्रह तजि, भ्रमे इकेलउ नृपति नल।

छीहल कहइ सुर नर असुर, कर्म रेख व्यापइ सकल॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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