मृग वन मंज्झि चरंति, डरिउ पारधी पिक्खि तिहि।

जब पाछिउ पुनि चल्यो, वधिक रोपियउ फंद तिहि।

दिसि दाहिणी सुं स्वान, सिंह ज्युं सनमुख धावै।

वाम अगिनि परजलिय, तासु भय जाण पावै।

छीहल्ल गमण चहुं दिसि नहीं, चित चिंता चिंतउ हरण।

हा हा देव संकट परयौ, तुझ बिन अवर की सरण॥

स्रोत
  • पोथी : कविवर बूचराज और उनके समकालीन कवि ,
  • सिरजक : छीहल ,
  • संपादक : डॉ. कस्तूरचंद कासलीवाल ,
  • प्रकाशक : श्री महावीर ग्रंथ अकादमी, जयपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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