एकादसि दिन प्रात नयर प्रबिसत वह रक्खस।

जुज्झत हनि तव जनक तिहिं सु खायो परिकर तस।

बहुरि बसावन द्रंग मनुज तव जनक बुलाये।

खाये ते सब खोजि कतिक भज्जे अकुलाये।

अजमेर बहुरि संभर नगर सुत तब खंधावार दुव।

उद्यान रहत क्रव्याद भय हेय सबन वह देस हुव॥

स्रोत
  • पोथी : वंश भास्कर भाग 3 ,
  • सिरजक : सूर्यमल्ल मीसण ,
  • संपादक : डॉ. चंद्रप्रकाश देवल ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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