ऊलग जाण की करइ छै बात।

हुं पण आवसुं रावलइ साथि।

बांदीय हुइ करि निरवहूं।

पाव तलासिसुं धोलिसुं वाइ।

ऊभीय पुहरइ जागिसुं।

इण परि ऊलगुं आपणउ राय॥

स्रोत
  • पोथी : बीसलदेव रास ,
  • सिरजक : नरपति नाल्ह ,
  • संपादक : डॉ. माता प्रसाद गुप्त, अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : हिन्दी परिषद प्रकाशन, इलाहाबाद ,
  • संस्करण : द्वितीय
जुड़्योड़ा विसै