रजनि जाम खिल रहत बज्जि गुड प्रखर बकत्तर।

अस्ववार हुव उभय सूर तोमर अरु संभर।

बिजयंत्र सु कबंध अनखि उततैं पहुंच्यो इत।

इततैं तुरग उठाय मिले ए नृप समुद्रमित।

सेना कबंध अहिव्यूह सुनि विपतिव्यूह संभर बिरचि।

ब्रहमंड अजक डारत बहुरि तमकि जुरे रसउग्र तचि॥

स्रोत
  • पोथी : वंश भास्कर भाग 3 ,
  • सिरजक : सूर्यमल्ल मीसण ,
  • संपादक : डॉ. चंद्रप्रकाश देवल ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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