कुमर दूत रनकाज अग्ग पठये मंडोवर।

नाहर भटन बुलाय कह्यो भलो इत संगर।

संक्रमि सोझति सरनि नैर पट्टनि लै अप्पन।

मिलि मित्रन सन मुररि रारि गंजहिं रिपु दप्पन।

करि यह प्रपंच लै निज कटक गुज्जरधर अंतिक गयो।

चहुवान समुख मैंनन चमू भट अटकन भेजत भयो॥

स्रोत
  • पोथी : वंश भास्कर भाग 3 ,
  • सिरजक : सूर्यमल्ल मीसण ,
  • संपादक : डॉ. चंद्रप्रकाश देवल ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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