तोवर तरनि अनंगपाल नृप बीरसेन सुव।

लहि जय सोम सहाय धरनि अप्पन रक्खी धुव।

अब दिल्लिय दुव आय छलत उपनद्ध करे छत।

सोम घाय चउसठ्ठि स्वबपु सत्रह रन संगत।

जयहेतु सुभट दुवघां जिते क्रम प्रसन्न सबबिधि करिय।

संभरहिं रक्खि बहुदिन सदन अतिहित कौरव अद्दरिय॥

स्रोत
  • पोथी : वंश भास्कर भाग 3 ,
  • सिरजक : सूर्यमल्ल मीसण ,
  • संपादक : डॉ. चंद्रप्रकाश देवल ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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