जाडां थंडां जियार, लोह आडां भड़ लागा।

जेण वार ‘जैसाह’, भिड़े हरवळ दळ भागा।

जु मसै दळ जहंगीर, अवर नह को आलंबण।

उण वेळा औरिया, थाट दारण दळथंभण।

रोकिया खुरम ‘भीमांण’ रा, दळ दहुंवै फाटां दळां।

घण जरद घाट सेलां घमक, वाजि झाट घण बीजळां॥

स्रोत
  • पोथी : सूरजप्रकास भाग 2 ,
  • सिरजक : करणीदान कविया ,
  • संपादक : सीताराम लालस ,
  • प्रकाशक : राजस्थान राज्य प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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