पर्बत तब तिनके पल्लीपति, सब मैंनन मेरन रचि संगति।

रोकीय आनि मग्ग गिरि घांटो, इत उत असह बढावन आंटो॥

हो पट्टनि चालुक्य सचिव जंहं, ता प्रति नाहर सुह्रद मिल्यो तंहं।

पृतना बलि चहुवानन उप्पर, बिखम थान लखि सजी धराबर॥

पित्थल इत दाहिन मग पद्धर, आवत हो पत्तन मंडोवर।

मिलि तिहिं जुब्बनराव बीचि मग, बुल्लयो इत किय व्यर्थ पग॥

मारव तो तजिगो मंडोवर, पत्तो धर गुज्जर सीमा पर।

उतके पथ बन दुर्ग बिखम अति, अरु तस चालुक सचिव मित्रमति॥

यातैं लहि दुर्गम भुव आश्रय, गब्ब धरत प्रतिहार तत्थ गय।

पथपेदी कोउ है पास हु, सो तुम जावत अग्ग निकास हु॥

स्रोत
  • पोथी : वंश भास्कर भाग 3 ,
  • सिरजक : सूर्यमल्ल मीसण ,
  • संपादक : डॉ. चंद्रप्रकाश देवल ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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