अन्नल सुत जयसिंह देव भूपति समर्थ हुव।

पाई जिहिं प्राचीन भाग्यबल करि निधान भुव।

गढ बिंटुलि बिच गड्डि धर‌यो जनक सु कढ्यो धन।

बीसलसर सन बीस कोटि आखनि लिय अप्पन।

धर्माधिराज अर्जित धनहु लाय खोज अगनित लये।

पहिले निधान उभय हि सुपहु द्विजन बंटि अविरत दये॥

स्रोत
  • पोथी : वंश भास्कर भाग 3 ,
  • सिरजक : सूर्यमल्ल मीसण ,
  • संपादक : डॉ. चंद्रप्रकाश देवल ,
  • प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ,
  • संस्करण : प्रथम
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