दिन दिन हे सखि दिन दिन नव नव भोग,

पूरे हे सखि पूरे हे सिंघल सुख सहु जी।

रलीया हे सखि रलिया दिन ने रात,

रहतां हे सखि रहतां हे दिवस बहु जी॥

स्रोत
  • पोथी : पद्मिनी चरित्र चौपाई ,
  • सिरजक : कवि लब्धोदय ,
  • संपादक : भंवरलाल नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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