जैन आगमां रै मुजब भारत में लिखाई कळा री सरूआत पैला जैन तीर्थंकर भगवांन आदिनाथ सूं होई। कहीजै के वां आपरी मोटी बेटी ब्राह्मी नै लिखणौ सिखायौ।

 

बात आ ही के पुरांणै जमानै में लोगां री याददास्त इतरी आछी ही के लिखणै रौ कांम कम ई पड़तौ। गरू आपरा चेलां नै मुख-जुबांनी ग्यांन दिया करता। औ धारौ सैकडूं बरसां तांईं चाल्यौ। पछै लोगां री याददास्त कम होवण लागी तौ सास्त्र वगैरा लिख’र राखणा जरूरी होयग्या। जैन ग्रंथां रै मुजब छेला तीर्थंकर भगवांन महावीर री वांणी भी करीब अेक हजार बरसां तांईं ‘मुख-बोली अर कांन-सुणी’ परम्परा सूं ईं चाली। कहीजै के पैलीवार वीर-निर्वाण रै 180 बरसां पछै सौरास्ट्र राज री वल्लभी नगरी में सगळा सास्त्र सामूहिक रूप सूं ताड़पनां माथै लिखीजिया।

 

भारत रा सगळा सूं पुराणा ग्रंथ ‘वेद’ है। वै ई बरसां तांईं मौखिक रूप सूं बरतीजता रह्या। ‘वेद’ री रिचावां बोलवा रौ या गावा रौ अेक अलग ई तरीकौ हौ। उण में सेळ-भेळ नीं होवै, इण बात रौ ध्यांन राख्यौ जातौ। बुद्ध भगवांन री वांणी भी पैली मौखिक रूप सूं ईं रही। पछै लिखीजवा में आई।

 

जठै तांईं ताड़पत्र री बात है, वै तौ ताड़ रूंख रा ई पांना हा, थोड़ा दिनां पछै टूटण लागग्या होसी, इणी वास्तै वीर-निर्वाण रै 180 बरसां पछै जिकी पोथ्यां लिखीजौ वां में सूं अेक भी पोथी आज मिलै कोनीं। हौळै-हौळै इस्या उपाय खोज्या गया होसी, जिकै सूं पोथ्यां लंबै बगत तांईं टिक सकै। ताड़ पत्रां री घोटाई हुई होसी। स्याई में ई केई प्रयोग हुया होसी।

 

जैसळमेर रा जैन भंडार

 

अबार ताड़पत्री पोथ्यां में उत्तर भारत में दसवीं सताब्दी री अेक ई पोथी बचियोड़ी है, जकी जैसळमेर रै जैन-भण्डार में मिळै। बाकी सगळी ग्यारवीं-बारवीं सताब्दी रै बाद री है। दक्षिण भारत में ईं ताड़पत्रां री पुरांणी पोथ्यां म्हारी जांणकारी में दिगम्बर सास्वां री ई मिळै, अर वै ई दसवी-ग्यारवीं सताब्दी री ई है। दक्षिण भारत अर उड़ीसा इत्याद में ताड़पत्र आरांम सूं मिळ जावता अर सस्ता हा, इयै कारण अबार तांईं ताड़ पत्रां रै ऊपर लिखवा रौ चळ-चळाव रह्यौ। अब छपाई रै जमांनै में ताड़पत्रां रौ बरतीजणौ बंद होगौ। ताड़पत्रां रै पछै कागजां माथै पोथ्यां लिखीजणी सरू होई। इक्की-दुक्की पुरांणी पोथ्यां नै छोड देवां, तौ तेरवीं सताब्दी री पुरांणी सूं पुरांणी पोथ्यां जैसळमेर रै जैन भंडार में अबार तांईं मिळै। जैन लेखकां पोथ्यां नै जित्ती जतन अर सार-संभाळ सूं राखी, उत्ती दूजा लोग कोनीं राख सक्या। इयै कारण जैन भण्डारां में ताड़पत्रां अर कागदां री जित्ती पुरांणी पोथ्यां मिळै उत्ती दूजा ग्यांन-भडारां में को मिळै नीं।

 

अबार जिकै प्रदेस नै राजस्थान कैवै वौ पैली अलग-अलग नामां सूं केई राज्यां में बंटियोड़ौ हौ। वां में सूं जिका राज्यां माथै मुसळमानां रा हमला होवता रह्या, वठै पुरांणा मिंदरां अर पोथी भंडारां रौ नास होवतौ रह्यौ। जैसळमेर इस्यौ इलाकौ हौ जकी जागा मुसळमानां रा हमला बौत कम होया। इयै वास्तै इण स्थांन नै सुरक्षित जांण’र जैनाचार्य जिन भद्रसूरि दो जैन मिंदरां रै बीच में अेक इसी जागा ग्यांन-भंडार री थरपना कीवी, जठै पोथियां री आछी तरह सुरक्षा होय सकै। बारै सूं तौ कीं पतौ ई कोनीं लागै के अठै कोई ग्यांन-भंडार होसी। छोटो-सो दरवाजौ, भीतर जांणै कोई गुफा होवै। भाटै री पापड़ियां, ऊंदरा के सील रौ कांम ई नीं। जे ताड़पत्री पोथियां है, तो बीच में पांना अर बारै दोनूं तरफ लकड़ी री पटड़ी, बीच में अर दोनूं कांनी सूं छेद में डोरौ पोय’र पटड़ियां रै ऊपर डोरै नै कस’र पळेट’र भाटै री सिलपटियां पर घणै जाबतै सूं मेलीजी ही। तौ ई राखतां-निकाळतां अर खोलतां-पढतां पोथियां खासी थकी नस्ट होयगी। म्हैं संवत् 1999 में जैसळमेर रै जिन भद्रसूरि ग्यांन-भंडार नै देखण नै पैलीवार गयौ, जद ताड़पत्र री पोथ्यां रा टूटोड़ा पानां री अेक संदूक भर्‌योड़ी पड़ी ही। वां पानां में केई तौ घणी पुराणी लिपी रा आखर लिखियोड़ा हा। स्यात आठवीं-नवीं सताब्दी रा होवै। पण पछै दूजी वार जैसळमेर भण्डार देखण नै गयौ, जद वै सब ताड़पत्र रा टूटोड़ा टुकड़ा जका-जका लोग आवता, कीं न कीं ले जावता, इण कारण सूं बच्या कोनीं। केई पोथ्यां रा पांना खुला पड़्या, केई दूजी पोथ्यां में बांधीजग्या। धिन है सरगवासी पूज्य पुण्य विजयजी महाराज नै जिका केई म्हीनां तांईं बठै रैय’र बच्योड़ी पोथ्यां रा पांना मिळा’र सब प्रतियां नै ठीक करी। रात रा बारा बज्यां तांईं वै पोथ्यां रै जीर्णोद्धार, मिलांण अर नकल इत्याद रौ कांम करता अर दूजा सूं काम करवाता। घणकरी पोथ्यां री माइक्रो-फिल्म भी करवा ली। मुनि जिन विजयजी भी म्हारै पैली वार जावण रै बाद ई जैसळमेर केई पंडितां री टोळी सागै गया। वां भी अलभ्य, दुर्लभ अर महत्व रा ग्रंथां री नकलां करवाई। वां में सूं केई ग्रंथ सम्पादित अर प्रकासित ई करवाया। वां सूं पैली भी समय-समय पर केई जैन मुनि, आचार्य वगैरा वठै गया अर जीर्णोद्धार रौ कांम कियौ। विदेसी विदवांन अर देस रा भी केई पिंडत औ भंडार देखण नै जावता रह्या, पण जिस्यौ जीर्णोद्धार रौ कांम पुण्य विजयजी कर्‌यौ, विस्यौ और कोई भी नीं कर्‌यौ। वां ताड़पत्रां री पोथ्यां रै वास्तै अलमूनियम री पोथी रै माप री डबियां बणवाई। और भी केई सुधार कर्‌या, जकै सूं औ भंडार अबै काफी सुरक्षित है। वठै रा केई बिस्या भण्डार भी इयै बडै भंडार मे सांमिल कर दिया गया। वां घणी मैणत कर इण भंडार री नई सूची विगतवार बणवा’र छपवा भी दी। आज राजस्थान में पुराणी पोथ्यां रौ औ ई सिरमोड़ अर बडौ भण्डार है। संख्या री निजर सूं तौ बीकानेर, जोधपुर अर जयपुर में पोथ्यां घणी ज्यादा है, पण जैसळमेर में पुराणी अर महताऊ पोथ्यां घणी है।

 

बीकानेर रा पोथीखांना

 

पुराणी पोथ्यां रा बीकानेर में भी केई भंडार है, अर सगळां नै मिळा’र अेक लाख सूं भी ऊपर पोथ्यां बां में पाई जावै। जैन भंडारां में सूं केई भंडार तौ मुनिजिन विजयजी रै प्रभाव सूं राजस्थांन प्राच्य विद्या प्रतिस्ठांन री बीकानेर साखा नै देय दिया, वां री पोथ्यां री संख्या करीबन 21 हजार है। आं में यति जयचंदजी अर श्री पुज्याजी रौ भंडार तौ घणौ ई आछौ है। बीकानेर रै बडै उपासरै में अेक दूजौ व्रहद ग्यांन भण्डार है, जकां में केई यतियां रै दियोड़ी पोथ्यां रा केई अलग-अलग विभाग है। कुल-मिला’र करीब आठ नौ हजार पोथ्यां इण भंडार में है। आंरी सूची केई बरसां पैली म्हैं केई म्हीनां लगा’र बणाई ही। केई अलग-अलग उपासरां इत्याद में ईं सैकडूं पुरांणी पोथ्यां मिळै, ज्यां में क्षमाकल्यांणजी रौ भंडार, पायचंद गच्छ रै श्री पूज्य जी रौ भंडार, यति रांमलालजी रौ भंडार, गोविंद पुस्तकालय, सेठिया लाइब्रेरी इत्याद खास है।

 

लगभग पचास बरसां पैली हाथ सूं लिख्योड़ी पोथ्यां री खोज अर संग्रै रौ कांम म्हैं सरू कियौ। अंतपार मैणत अर खरचौ कर परौ’र जगा-जगा सूं पोथ्यां खरीद’र भेळी करी। म्हारै बडै भाई अभयराजजी रै नांव सूं ‘अभय जैन ग्रंथालय’ री थरपना कीवी। बरसां री लगन अर लगातार चेस्टावां सूं म्हैं साठ हजार सूं ईं बेसी हाथ सूं लिख्योड़ी पोथ्यां इण ग्रंथालय में भेळी कीधी।

 

बीकानेर रा राजा अनुपसिंघजी भी बौत बडा साहित्य प्रेमी हा। वां रै नांव सूं ‘अनूप संस्कृत लाइब्रेरी’ अबार लालगढ में है। अनुपसिंघजी नै पोथ्यां लिखावण रौ भेळीकरण रौ इत्तौ सौक हौ के लिखारां नै साथै राखता, अर जठै जावता वठै ई कोई चोखी पोथी देखता तौ बींरी नकल कराय लेवता, इनै-बिनै सूं जकी भी पोथ्यां हाथ लागती, वां नै भेळी कर’र बीकानेर भेज देवता। सतरवीं सताब्दी रा प्रसिद्ध विदवांन कवीन्द्राचार्य जिका घणा सास्त्रां रा जांणकार अर बादसाह साहजहां रा खास मानेता हा, वां रै संग्रै री बौत सी पोथ्यां अनूपसिंघजी री लाइब्रेरी में आयगी, अर केई जैन विदवांन इयै ग्रंथालय नै काफी प्रतियां भेंट करी। राज्याश्रित गोस्वामी अर चारण वगैरा ई इयै पोथी खांनै में बढोतरी करी। इयै पोथीखांनै में पनरै हजार सूं ईं पोथ्यां है, अर बां में बौत सा ग्रंथ दुर्लभ अर घणा अरथाऊ है। देस-परदेस में औ पोथी भंडार घणौ प्रसिद्ध है। धर्मसास्त्र, तंत्रसास्त्र इत्याद घणा सारा विसयां रा संस्कृत ग्रंथा रै साथै राजस्थानी अर हिन्दी रचनावां री काफी पोथ्यां इयै पुस्तकालय में है। बीकानेर रै भारतीय विद्या मंदिर सोध प्रतिस्ठांन अर संत-महंत संग्रै में ईं घणी पोथ्यां लाधै।

 

जैपर-जोधपुर रा पोथी-भंडार

 

बीकानेर री गळाई जोधपुर अर जैपर में ईं पुरांणी पोथ्यां रौ भौत संग्रै है। जोधपुर में सब सूं बडौ संग्रै राजस्थांन प्राच्य विद्या प्रतिस्ठांन में मुनि जिन विजयजी रै प्रयत्नां सूं होयौ। अबार अठै पैंताळीस हजार सूं ऊपर पोथ्यां है। इणीं तरै दूजौ संग्रै डा. नारायणसिंघजी भाटी री कोसिस अर मैणत सूं राजस्थानी सोध संस्थान चौपासणी में है, जिणमे करीब 20 हजार प्रतियां है। जोधपुर राजावां रै परम्परागत संग्रै ‘पुस्तक प्रकाश’ (महाराजा मानसिंघ पुस्तकालय) में ईं केई हजार पोथ्यां है। केसरियानाथजी रौ मिंदर इत्याद केई मिंदर, उपासरा, अर स्थानकवासी मुनिप्रवर रत्नचंद जी इत्याद थानका में, जैन रत्न पुस्तकालय, सेवा मिंदर, इत्याद केईं आछा जैन ग्यांन भंडार है, वां में हजारूं पोथ्यां है। इयां मिला’र जोधपुर में ईं करीब अेक लाख पोथ्यां मिल जासी।

 

जैपर में राजावां रौ परम्परागत पोथीखानौ बौत प्रसिद्ध है। बीं में करीब अठारह हजार पोथ्यां सुणीजै। बां री दो सूचियां छपी है। राजस्थांन प्राच्य विद्या प्रतिस्ठांन री जैपर साखा में हजारूं पोथ्यां है।

 

जैपर में जैन पोथी भंडार भी बौत है। स्वेताम्बर मूर्तिपूजक समाज रौ अेक भंडार खतर गच्छ रै उपासरै में है। स्थानकवासी सम्प्रदाय रौ लाल भवन में बौत बड़ौ संग्रै है। ईं में पूजनीक हस्तीमलजी महाराज री प्रेरणा सूं अबार केई बरसां में हजारूं पोथ्यां खरीदीजी अर दूजी जगा सूं मंगाय’र भेळी करीजी है। कुळ मिला’र करीब बीस हजार पोथ्यां रौ संग्रै ‘विनयचंद ग्यांन भंडार’ रै नांव सूं लालभवन में है।

 

जैपर में दिगम्बर सम्प्रदाय रा काफी घर अर मिंदर है। दिगम्बर मिंदरां में प्राय छोटौ-मोटौ पोथी भंडार रैवै। आमेर रै भट्टारबां रौ अेक आछौ भंडार महावीर भवन में है। दूजा दिगम्बर मिंदरां में ईं बौत सा सास्त्र भंडार है। कुल मिला’र बीस सूं पच्चीस हजार पोथ्यां दिगम्बर सास्त्र भंडारां में सुरक्षित है आं री सूचियां भी ‘महावीरजी तीर्थ क्षेत्र सोध विभाग’ सूं प्रकासित होय चुकी है। केई और जग्या रा सास्त्र भंडारां री सूची भी सम्मिलित कर पांच बडा-बडा भाग प्रकासित कर दिया है। इण तरह कुल-मिला’र जैपर में भी अेक लाख सूं ऊपर पोथ्यां होसी।

 

उदैपुर, कोटा, टोंक अर अजमेर

 

उदैपुर में भी जूनी पोथ्यां रा केई भंडार है। जकां में महारांणा रौ पोथी भंडार तौ राजस्थांन प्राच्य विद्या प्रतिस्ठांन रै सुपुर्द है। साहित्य सस्थांन में काफी पोथ्यां है। आं दोनूं भंडारां री सूचियां ईं छप चुकी है। सीतलनाथजी रै जैन मिंदर अर हाथीपोळ इत्याद में स्वेताम्बर जैन भंडार अर दिगम्बर जैन मिंदरां में दिगम्बर भंडार है। बां री पोथ्यां री संख्या ठीक सूं बताई को जाय सकै नीं।

 

उदैपुर रै नजदीक कांकरोली अर नाथद्वारा में वल्लभ सम्प्रदाय रा आछा पोथी भंडार है। वां में कांकरोली रै भंडार री सूची तौ म्हारै देख्योड़ी है, पण नाथद्वारै रै भंडार री सूची देख को सक्यौ नी। संस्कृत अर हिन्दी रा बहुत सा दुर्लभ ग्रंथ आं भंडारां में है। व्यक्तिगत संग्रै भी सभी जग्यां होसी, पण वां री पूरी जांणकारी भेळी करणी मुसकिल है।

 

कोटा में ईं केई पोथ्यां रा आछा भंडार है। राजावां रौ परम्परागत संग्रै तौ राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिसठान में आय ई ग्यौ। वल्लभ सम्प्रदाय रौ ई काफी अच्छौ भण्डार अठै सुणीजवा में आवै। स्वेताम्बर अर दिगम्बर मिंदरां अर उपासरां में ईं काफी पोथ्यां है। महो. विनय सागरजी कनै भी काफी पोथ्यां है।

 

टोंक में अरबी-फारसी री पुराणी पोथ्यां रौ आछौ संग्रै मिळै। वां में केई पोथ्यां तौ इतिहास री दृस्टि सूं घणी महताऊ है। अब अलवर नै लेवूं। अलवर रा राजावां रौ पोथी-भंडार तौ राजस्थांन प्राच्य विद्या प्रतिस्ठांन रै मांय आय ई ग्यौ। अेक स्थानकवासी सम्प्रदाय रौ संग्रै ई अठै ठीक-ठीक है। बाकी अलवर री विसेस जांणकारी म्हनै कोनीं।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थांनी मासिक) ,
  • सिरजक : अगरचन्द नाहटा ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन
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