राजस्थानी गद्य री परंपरा घणी जूनी अर जाणीती। आज सूं कोई पांच सौ बरस पै'ली जद संसार री कई भाषावां रौ जनम ई कोनीं व्हियौ, राजस्थानी में घणौ सांतरौ गद्य लिखीजतौ। वि० सं० 1330 में 'आराधना' नाम सूं एक जैन ग्रंथ में लिख्योड़ी टिप्पणी इण रौ पुखता प्रमाण। गाडण शिवदास रचित 'अचलदास खीची री वचनिका' (सं. 1475), माणिक्य चन्द्र सूरि कृत 'पृथ्वीचन्द्र चरित्र' (सं. 1478), 'मूहता नैणसी री ख्यात' (सं. 1707-22), 'दयाळदास री ख्यात' (सं. 1855-1648) अर 'दलपत विलास' जिसा अनेकूं विख्यात गद्य-ग्रंथ राजस्थानी गद्य री सबळ परंपरा री साख भरै। उण जमाना में राजस्थानी गद्य में सगळी शैलियां अर विधावां रौ विकास व्हियौ—ख्यात, वात, वचनिका, दवावेत, हाल, पट्टा परवाणा, विगत, टेवा, जनमपत्रियां, शिलालेख, वैद्यक, ज्योतिष, शकुन-शास्त्र अर सभा-सिणगार इत्याद जिणमें प्रमुख है। राजस्थानी गद्य रै विकास रौ औ क्रम कोई च्यार-पांच सौ बरसां तांई लगौलग चाल्यौ। इण सूं उणरौ रूप निखरयौ। मूहता नैणसी रौ गद्य उण बखत रौ टकसाळी रूप कह्यौ जा सकै।
प्राचीन गद्य री इतरी लांबी परंपरा व्हैतां छतांई कई शब्दां में अनेकरूपता पण मिळै। एक इज शब्द न्यारी-न्यारी रचनावां में न्यारा-न्यारा रूप में मांड्योड़ौ निंगै आवै। आ प्रवृत्ति गद्य रै सागै पद्य में पण देखण में आवै। इण रा दो-तीन कारण व्है सकै। राजस्थानी साहितकारां री स्वतंत्र पद्धति, क्षेत्रीय बोलियां रौ विसेस प्रभाव अर छापै री कळ रौ अभाव। यां में सूं कोई कारण प्रमुख रह्यौ हौ पण आ बात खरी के प्राचीन गद्य रा कई शब्दां में अनेकरूपता जरूर मिळै। पण इण मामूली भेद रै सागै-सागै राजस्थानी गद्य री सगळी विधावां में शैलीगत अर विधागत एकरूपता रौ क्रम चालु रह्यौ अर इण री चरम सीमा नैणसी रै गद्य अर 'दलपत विलास' जिसी कई कृतियां में देखी जाय सकै।
इण भांत राजस्थानी गद्य रा क्षेत्र में जूनी साहित संपत्ति इतरी बोहळी मात्रा में मौजूद है के जिकण माथै गुमेज कियौ जावै अर प्रेरणा ई ली जाय सकै। पण 'टोटा तब ही जाणियै, जद करै पुराणी बात' वाळी कहावत रै माफक देखणौ ओ है के वडेरां रो इण पूंजी में अबार तांई कीं वधोतरी हुई है के दिन-दिन घाटौइज पड़यौ है? इण बात माथै विचार करां तो 'तीजी पीढी बावड़ै के तीजी पीढी जाए' वाली कहावत निंगै आवै। चवदमी सदी सूं लगाय नै उगणीसमी सदी तांई सतत प्रवाहित राजरथानी गद्य स्त्रोत में आगै जाय नैं अवरोध निगै आवै। पण ओ अवरोध घणा वखत तांई कायम नीं रैवै अर तीजी पीढी पाछी बावड़ण लागै जद होळै-होळै उण में जागृति आवण लागै। राजस्थानी बुद्धिजीवियां रौ ध्यान पाछौ आपरी मायड़ भाषा कांनी जायै अर वे अंतः—प्रेरणा सूं इणरा पुनरुत्थान में लाग जावै। लारला पचास बरसां सूं सैकडूं कवि लेखक मायड़ भाषा री सेवा में लाग्योड़ा है। देखणौ ओ है के वांरी मैंणत कठा तांई सफळ हुई है अर जे मन माफक सफळता नीं मिळरी है तो उणरा कारण कांई है?
गद्य भाषा री कसौटी मानीजै। कोई पण भाषा रौ स्तर उणरा गद्य सूं आंकीजै। आधुनिक राजस्थानी गद्य में लारला कीं बरसां सूं सगळी विधावां में खासौ भलौ साहित लिखीज रह्यौ। अर वीं में नुंवा-नुंवा प्रयोग ई व्है रह्या।
पण इरण में सै सूं मोटी कमी एकरूपता री रही। 'बारा कोसां बोली पलटै' रौ कुदरती नेम आद जुगाद सूं चालतौ आयौ अर दुनिया कायम रहसी जठा लग बराबर चालतौ रहसीं। फगत राजस्थानी खातर आ कोई नुंवी बात कोनी। इण वास्तै सै सूं पैली बोली अर भाषा रौ फरक समझरणौ पड़सी। कोई सबळी बोली होळै-होळै काळांतर में भाषा रौ रूप ग्रहण कर सकै पण जे हर बारै कोस माथै पलटण वाळी हरेक बोली भाषा बणणी चावै तो ओ मामलौ किंयां बैठ सकै? लारला की बरसां सूं आ भावना जोर पकड़ती निंगै आवै के म्हूं बोलू अर लिखूं सो सांची ग्रर बाकी सै बकवास। आ 'म्हूं कहूँ सो सांची अर बाकी सै काची' री भावना राजस्थानी नै भंवरजाळ में तो जरूर नांख देसी पण आगै तो कोनी बढण देवै। अणगिण पगडांडियां माथै चालनै छेवट एक मथारै तो पूगणौ पड़सी। कठैई नैं कठैई पूग नै छेवट की बात तो तै करणी पड़सी। इण रै बिना काम पार कियां पड़सी?
आ बात खोटी कोनीं के भाषा री एकरूपता रौ सवाल कमरा में बैठ'र कीं आदमी तै नी कर सकै। सतत प्रयोग अर व्यवहार सूं वखत लागां जिकी एकरूपता मतैई होळै-होळै आसी वा कायम रहसी। पण इण रै सागै आ बात पण सही के कीं मोटी-मोटी बातां 'गाईड लाईन' रा रूप में जरूर तय करणी पड़सी। इण रै बिना मामलौ हरगिज नीं बैठै। अबार री हालत में राजस्थानी री गाडी नै चईलै माथै आवतां तो कई पीढियां लाग सकै।
मराठी-गुजराती इत्याद भाषावां में इणीज ढंग रा प्रयोग सरूपांत में व्हिया अर वे घणा सफळ रह्या। इण सूं उठै रा लेखकां नै मारग लाधौ अर होळै-होळै भाषा में एकरूपता आई। आज वे भाषावां कठै पूगगी है, कोई सूं छांनै कोनी, जग जाहर बात है।
इण वास्तै राजस्थानी गद्य री एकरूपता खातर भूतकाळ में जिकाई प्रयत्न व्हिया वे सरावण जोग है अर भविष्य में व्हैसी वे पण स्वागत जोग है। पूर्वाग्रह रै वसीभूत होय नै वांनै वेहम अर हिकारत री निजर सूँ देखणौ कोई रै वास्तै फायदामंद कोयनीं।
इण बावत आंपां नै, खासकर गद्य लेखकां नै क्षेत्रीयता रौ मोह छोड़ नै व्यापक हित री दीठ सूँ विवेक सूं काम लेवणौ पड़सी। पूर्वाग्रहां नै छोड़ नै उदारता सूं सोचणौ पड़सी। राजस्थान री च्यार-पांच प्रमुख बोलियां—मारवाड़ी, मेवाड़ी, ढूंढाड़ी, हाडौती अर मेवाती इत्याद में सूं जिकण बोली में परंपरा सूं गद्य घणौ लिखीज्यौ, जिकौ सैकडूं बरसां रा प्रयोग व्यवहार सूं एक स्तर माथै पूगगो, उणनै 'स्टेंडर्ड' रूप में अपणावणोज पड़सी। ओ एक व्यवहारिक मारग है अर इण रै अलावा दूजौ कोई रस्तौ पण नीं।
गुजराती में सागण आ इज बात हुई। उठै कच्छी, काठियावाड़ी (सूरती) अर अहमदावादी तीन बोलियां प्रमुख ही। सरूपांत रा थौड़ाक दिन इण बात री खांचातांण रही के किण बोली नै 'स्टेण्डर्ड' गुजराती मानी जावै? इण तीनूं बोलियां में अहमदाबादी समृद्ध ही। उण में मोकळौ गद्य मौजूद हौ। इण वास्तै गुजराती साहितकारां क्षेत्रीयता सूं ऊपर उठनै विवेक सूं काम लियौ अर उणनै गुजराती रौ 'स्टेण्डर्ड' रूप मान लियौ। तत्कालीन राजनेतावां रौ उणनै तन-मन सूं टेकौ मिळयौ अर वा टकसाळी गुजराती रै रूप में थापन व्हैगी। इण सूं प्रांत रौ कल्याण व्हैग्यौ अर बोलियां नै पण कीं नुकसाण नीं व्हियौ। आज ई कच्छी अर काठियावाड़ी पोत-पोता री विशेषतावां लियां कायम है अर कयामत तांई कायम रहसी, वांनै कोई मिटाय नीं सकै।
राजस्थानी गद्य री एकरूपता खातर ई साहित-अकादमी अर दूजी संस्थावां नै वर्कशॉप टाईप इसा मेळावड़ा (बरस में दो-तीन) जरूर करणा चाहिजै। इण मेळावड़ां में फालतू री भीड़ भेळी नीं करनै काम रा आदमियां नै बुलावणा चाहिजै—सृजनशील गद्य लेखक, दो-तीन जीवंत कवि, राजस्थानी पत्र-पत्रिकावां रा संपादक अर भाषा विद नै कोषकार इत्याद। अै सगळाई मिळनै पांच-सात दिन जम नै चरचा करै। एकरूपता खातर जिकौ फैसला पै'ली व्है चुका वां री व्यवहारिकता नै परखै अर नुंवा निर्णय पण लेबै। इण भांत विचारां रौ आदान-प्रदान खुलै दिमाग सूं होवतौ रैवै अर लियोड़ा निर्णया माथै ईमानदारी सूं चालणै री पालणा होवती रैवै तो राजस्थानी खातर घणौ मोटौ काम हुवै।
म्हारै मत सूं राजस्थानी गद्य री एकरूपता खातर जिकौ मोटी-मोटी बातां तै करण री जरूरत है, वां में सूं कीं इण भांत है: —
1. संस्कृत तत्सम शब्दां नै बोहळाई सूं अपणाया जावै। इण बिना भाषा रौ विकास संभव कोनीं। तद्भव अर बोलचाल री मदद सूं लोककथावां तो लिखी जाय सकै पण इण सूं आगै वधणौ बस री बात कोनीं। भारत भोमरी सगळी प्रांतीय भाषावां संस्कृत रा तत्सम शब्दां सूं आपरौ भंडार भर नै आगै वधी है। आंपां नै उण सूं सीख लेवणी चाहिजै। तत्सम शब्दां नै तोड़-मरोड़ नै वांनै विडरूप वणाय देवणा मोटी भूल है, इण सूं बचणौ चाहिजै। दाखला रूप में 'संस्कृति' नै 'सैंसकरती', 'प्रकृति' नै 'परकरती' अर 'श्रीमान' नै 'सिरीमान' लिखण में कीं तुक कोनीं। तत्सम शब्दां नै तौ मूळ रूप में इज लेवणा चाहिजै। पण जिकौ शब्द बोलचाल री भाषा में ढळग्या है, वां नै उण रूप में लिखण में कीं एतराज कोनीं।
2. लिपि सुधार रै नाम माथै 'अ' आखर रै ऊपर नीचे मात्रावां लगाय नै अि, अी, अु, अू अे, अै इत्याद आखर बणावणा ई उचित कोनीं। इण खातर जिकौ प्रचलित आखर है वांनै इज प्रयोग में लावणा ठीक है। इण वास्तै हिंदी में ई कीं दिन प्रयत्न व्हिया हा पण बातड़ी पार कोनीं पड़ी। सो अबै इण बांच्योड़ा खत नै पाछौ बांचण में की सार कोनीं।
3. राजस्थानी में आंपां तालवी 'श' 'ष' नै अंगांई देश निकाळौ देवण री मंशा बणाय राखी है पण इण बात माथै गहराई सूं विचार करनै पुखता निर्णय लेवणौ ठीक रहसी। राजस्थानी री मूळ प्रकृति इण आखरां रै अनुकूळ कोनीं कैय नै इण मसला नै टाळ देवणौ समझदारी कोनीं। भारत भोम री सगळी प्रांतीय भाषांवां इण आखरां रौ प्रयोग करै अर आंपां नै इणां सूँ टाळौ लियां कई अबखाईयां रौ मुकाबलौ करणौ पड़सी। उदाहरण सरूप संस्कृत तत्सम शब्दां में जठै 'श' 'ष' रौ प्रयोग व्हियौ है वांनै बिना बिगाड्यां किण भांत लिखणा? अर जे मूळरूप में लिख्या जावै तौ पछै टाळौ कठै व्हियौ। उण हालत में 'भाषा' नै 'भासा' लिखण में कोई तुक कोनीं। उठीनै माध्यमिक स्तर माथै हिंदी रै सागै राजस्थानी पढणिया विद्यार्थी नै 'शर्मा' री ठौड़ 'सरमा' अर 'भाषा' री ठौड़ 'भासा' लिखतां घणौ अटपटौ लखावै। हिन्दी रा हितचिंतक ई ओळबौ देवता निंगै आवै के आगै ई तो बाबोजी फूटरा घणा अर फेरूं रमाय ली भभूत! अबै सरूप रौ कांई पुछणौ! यूं ई छोरा हिंदी में कमजोर होवण सूं निरी खोटां लिखता हा अर अबै रही सही कमी राजस्थानी आयनै पूरी करदी।
4. जूनी राजस्थानी में अति प्रचलित कीं शब्दां यथा-हेक, तणी, गयांह, आवंती इत्याद नै अबै अंगांई छोड़ देवणा चाहिजै। यां री ठौड़ एक, रौ, गयौ अर आवती लिखणौ इज उचित है।
5. सानुनासिक शब्दां में पैलड़ा आखर माथै अनुस्वार लगावण री प्रथा नै ई अबै तिलांजलि देय देवणी ठीक रहसी अर रांम, नांम, कांम इत्याद री ठौड़ राम, नाम, काम लिखणौ इज उचित रहसी।
6. संबंध कारक विभक्ति वास्तै प्रदेश में तीन भेद प्रचलित है—का, की, के, रा, री, रे अर गा, गी, गे। थांकौ, म्हांकौ, वांकौ, थांरौ, म्हांरौ, वांरी अर थांणां, म्हांणां, वांणां। फिलहाल तीजा रूप नै छोड़ नै पैलड़ा दोनू रूपां नै चालण दिया जावै तो कोई एतराज कोनीं अर बोहळा प्रचार रै कारण रा, री, रै, नै मंजूर कर लियौ जावै तौ औरू ई आछौ। इणीज भांत भविष्यत् काळ खातर प्रयुक्त आवैगौ, जावैगौ, खावंगौ, आवैला, जावैला, खावैला अर आसी, जासी, खासी बाबत ई फिलहाल छूट राखी जावै अर काळांतर में आसी, जासी, खासी रूप नै स्वीकार कर लियौ जावै तो उचित रहसी।
7. सन् 1966 में राजस्थानी गद्य री एकरूपता खातर राजस्थान साहित्य अकादमी कांनी सूँ राजस्थान भाषा प्रचार सभा जयपुर रै मार्फत एक गोष्ठी आयोजित हुई ही। वीं में जिका निर्णय लिरीज्या वे घणा उपयोगी अर सरावण जोग हा। संगम नै वांरा रिप्रिंट कढाय नै घणौ सूं घणौ प्रचार करणौ चाहीजै।
इण भांत जे बार-बार प्रयत्न व्हैता रैवै तो राजस्थानी गद्य में जरूर एकरूपता आवै।