राजस्थान रा लोक नाट्य 'ख्याल' रै नांव सूं ओळखीजै। अठैरा जुदा-जुदा अंचळां मांय ख्यालां री रंगत अर शैली जुदी-जुदी होवण सूं ख्यालां रा नांव ई जुदी-जुदी ओळखाण देवै। ज्यूं चित्तोड़-घोसूंडा रा तुर्रा-कलंगी रा ख्याल, भरतपुर-करौली रा नौटंकी ख्याल, जैसलमेर-बीकाणै रा रम्मती ख्याल अर मेवाड़ रा रासधारी ख्याल। इणां ख्यालां रा नांव आपरै छेत्रां सूं ईं जुड़्या मिळै। जिण भांत मारवाड़ी, किशनगढ़ी, शेखावाटी, चिड़ावी अर मेवाड़ी इत्याद। इण ख्यालां रा केई दूजां नांवां में खेल, तमासा, सांग, संगीत इत्याद नांव ई सुणवा में आवै। ख्यालां री पोथ्यां में टप्पा, नाटिका, ब्यावला, सिलोका जिसा सबद ई ख्याल रै ठौड़ लिख्योड़ा मिळै। सगळा ई ख्याल आपरी रंगत, शैली, निरत, संगीत, अर मंच मांडण री कला में आपरी न्यारी खासियत, ठसक अर ठौड़ राखै।

उस्ताद इणां ख्यालां रा गुरु होवै। ख्याल मंडळी—जठै ख्याल सीखै या करै—वा जगै अखाड़ौ बाजै। सगळा खिलाड़ी उस्ताद रौ मान-सम्मान राखै। वे ख्याल सरु कियां पैली उस्ताद नै ध्यावै (चिमनलाल मोती री किरपा, फतै अखाड़ौ पाऊं! ध्यान धरूं गोपाळदास कौ, राखै मान सवायौ!) पछै ख्याल रौ काम सुख सांयती सूं पार लगावण सारू देवी भवानी अर देव गणपत नै सुमरै (म्हैं छूं सेवक आपकौ रे, ख्याल उतारौ पार), भूल-चूक बतावण नै (भूल्योड़ा हरफ बताय दीज्योजी), दध आखर टाळण नै अर ख्याल दंगळ में मंगळ करण नै (दध आखर कूं टाळ भवानी, करज्यो दंगळ में मंगळजी) सबद कहीजै। लुच्चा, लंपट, चोर, चकार, अर दुस्मणां री अक्कल ठिकाणै लगावण नै अर वांरा मूंडा काळा करण सारू इस्ट देवां रौ सुमरण करीजै। बीं बखत खेल देखणिया ई हाथ जोड़’र आपरौ माथै झुकावै अर देवी-देवतावां नै निमण करै।

रात री कोई नव-दस बज्यां सूं खेल सरु होवै, सो सूरज री उगाळी तांईं चालै। खेलां में राजा भरथरी, सती सावित्री, जगदेव-कंकाळी, पचफूलाराणी, राजाहरिचंद, आसौ-डाबी, ढोला-मरवण, मूमल महेन्द्रौ, पाबू राठौड़, गोगो चव्हाण, दयाराम धाड़वी, मालदे राणी, राजा केवाट, बगड़ावत भारत, राजा नळ, अमरसिंघ राठौड़, राव रिसालू, डूंगजी-जवारजी, भंवर-चमेली, नौटंकी शाहजादी, सुल्तान निहालदे, मस्त परी, नैनो खसम, काकी-जेठूतौ, छोटौ बालम, भगत पूरणमल, रुकमणि मंगळ, नरसी मेहता, गोपीचंद, चंद मलियागिरी पर मीरा-मगळ इत्याद चावा अर ठावा नांव है, जिका लोगां री जबान माथै हर बगत चढ्या रैवै।

खेल देखणिया अर खेल करणिया—दोन्यूं इण खेलां रा पूरा-पूरा जाणकार होवै। इण कारण खेल री मामूली भांग-तोड़ के साधारण गळती ई वे कोनी खमै। जे कोई खिलाड़ी गळत काम करै, गळत गावै-बजावै, गळत ढंग सूं पेश आवै, तो लोग-बाग खेल बिच्चै ई बीं नै टोक दे अर कदै-ई-कदै ई तो देखण वाळा मांय सूं ईं कोई मोट्यार मंच माथै आय’र खेल करण लाग जावै, पण ओछौ अर हळकौ काम बरदास्त नीं करै।

ख्याल करणियां नै गांव रा लोग अछन-अछन करै। वां नै पूरौ मान-सनमान अर इज्जत-आबरू बखसै। कपड़ै-लत्तै सूं लगायनै गहणा-गाठां तांईं वांनै भेंट सरूप देवै। केई वार गांवड़ां में आपसरी में होड ई चालै। वदा-वदी में लोग खेलां रौ रंग सबायौ जमावण खातर जान स्यूं लाग ज्यावै।

ख्यालां में सगळां सूं सिरै मंच तो तुर्रा-कलंगी रौ मंडै। सोळै-सोळै फीट ऊंची तो अट्टाळी बणै। कोर-किनारौ अर भांत-भांत रा सोवणा कपड़ा-लत्तां सूं म्हैलनुमा अट्टाळी रौ सिणगार कियौ जावै। राणीजी आपरै म्हैल सूं निसरणी रै पगां नीचा उतरै अर सवाल-जवाब करता थका आपरी ओळखाण देवै। सोनै-रूपै रै गहणै-गांठै सूं राणीजी री केसरवरणी काया जगमगाट करती लखावै। राजाजी देखवा वाळां में सूं उठ’र मंच पै आवै। लारै पूरौ लवाजमौ रैवै। पछै खेल री रंगत जमै। टेरिया टेर देवै, बजावणिया बाजा बजावै अर ठंडी रात में कोसां तांईं खेल रौ रेलौ लोगां नै हेलौ देय वांरौ हियौ मुळकावै।

अे ख्याल इतरा जबरा होवै के आं में लुगायां काम नीं कर सकै, इण कारण लुगायां रौ काम आदमी ई करै। इण बात रौ ध्यान राखीजै के राणियां इत्याद रौ काम ओपता अर रूपाळा मोट्यारां सूं कराईजै। सखियां-सहेल्यां रौ काम कम उमर रा छोरां कनै सूं करायौ जावै। सगळी ख्याल-पार्टियां इणनै आपरौ धंधौ जाण’र पूरी ईमानदारी सूं करै। खिलाड़ियां, गवैयां, बजंत्रियां अर दूजा काम करणियां रौ माहवारी हिस्सौ पैसौ-कौड़ी बंध्यौ रैवै। मंडळी रौ उस्ताद मंडळी रौ संचालण करै अर ख्याल करै अर ख्याल में उस्ताद ई खास अभिनय करै। चिड़ावा रा नानू इलिया, बुड़सू रा लच्छीराम, चित्तौड़ रा चैनराम अर मेड़ता रा उगमराज इत्याद नामी खिलाड़ियां आप आपरी मडळियां बणाय’र बंबई, कलकत्ता अर बैंगलोर तांईं नांव कमायौ अर राजस्थान रौ रंग मांड्यौ।

राजस्थान रा मेळां-खेळां मांय इण ख्याल-मंडळियां रा खेल देखबा खातर रात-रात भर भीड़ डटी रैवै। मेळौ भळांईं पुष्कर रौ होवौ के नागौर रौ, रामदेवरा रौ होवौ के तिजारां रौ—पैली सूं ईं मंडळियां रौ प्रचार सरु होय जवै। खिलाड़ियां रौ अभिनय इतरौ सांतरौ अर प्रभावसाळी होवै के लोगां नै हंसाय-हंसाय नै लोट-पोट कर नांखै।

इण खेलां री विशेषता आ के इणां रा संवाद लिख्योड़ा के रट्योड़ा नीं होवै। मंच माथै आयां लोगां रौ उमाव देख’र खिलाड़ियां रै मूंडै सूं संवाद स्वत: गंगा री दाई मतैई खळकै। आ बात ई कोनीं के अे फगत हंसी-मजाक ई करै। ख्यालां रै माध्यम सूं आज री ज्वळंत समस्यावां माथै ई करारी चोट करीजै, समाज में व्याप्त कुरीतां, बेकारी री समस्या, अंध विसवास अर राजनीतिक ठगवाड़ै री कळाबाजियां इत्याद री पोल ई जबरी खोलीजै। धकै चढ्यां पछै कोई नै नीं बगसै। सगळां री पत्थर रगड़ नै धर दे। रौळां-रौळां में इसौ माजनौ पाड़ै के पाणी उतार नांखै।

खेल में मनोरंजन रौ पगस खास रैवै। लोक मनोरंजन सारूं हंसी-मजाक रौ अेक नमूनौ देखौ-च्यार छोरियां बाबाजी कनै जागरण कराबा नै आवै। बाबौजी धूणी रमायां बैठ्या अर छोरियां छमछम करती मंच पै आवै। वांरा चरपरा संवादां री बानगी इण भांत है—

छोरियां : बाबाजी नै म्हांरा पगै लागणा!

बाबौजी : अरे! ट्यूब लाईटां ज्यूं थे कुण आईं हौ अे? थां नै देख’र म्हारौ मन जबक-धबक करण लाग्गयौ।

पैली छोरी : बाबाजी, म्हे थां सूं (जागरण) कराबा नै आई हां”।

बाबौजी : म्हां सूं कराबा नै आई हौ?

दूजी छोरी : हां, थां सूं कराबा नै आई हां।

बाबौजी : थे कुण हो?

तीजौछोरी : म्हैं थांरी सातूं ईं पीढियां।

बाबौजी : तो आगड़ी बळौ अठै सूं।

चौथी छोरी : नीं बाबैजी थांनै करणौ ई पड़सी! (बाबौजी नै झल्लौ देवौ) (औ संवाद सुण’र लोग-लुगायां हंसै जद अेक छोरी वांनै कैवै) थे क्यूं हंसौ अे बायां? म्हैं तो बाबैजी कनै जागरण कराबा नै आई हां। थे थांरै घरां कोनीं करावौ के?”

पैली छोरी : तो बाबाजी, अबै फुरती करो। ढील कियां काम पार नीं जावै।

बाबौजी : तो थे रागणी मिळावौ, म्हूं म्हारौ सुर साधूं। (बाबौजी दूहौ बोलै)

सदा मनाऊं केतली, सनमुख रहे पलेट।

तीन देव रिच्छा करै, पान, बिड़ी सिगरेट॥

सियावर रामचंद्र की जै!

ईं हंसी मजाक रै बिचाळै बाबौजी निरत गीत रौ घमचौ छोड़ै—“थूं है छोरी बी. अे. पास, तो म्हैं हूं छेलौ ती.अे.” अर देखतां-देखतां आखै मंच माथै झपाटै सागै नाच-गाण री बिजळियां झबूका लेवण लागै। इणी उछाव आणंद में लोग आप आपरी जेबां संभाळै अर मंच पर पैसां री बिरखां होवण लागै। निछरावळ करणियां रा नांव-ठांव लेय’र वांरी गावणी-लावणी करीजै, जिणसूं दूजां रौ ई जोस बधै। गावणी-लावणी रा कीं नमूना इण भांत है—

पीरूदानजी दीनौ रुपियौ, रोकड़ यौ रंगदार।

पीर बाबा वांनै छोरा दीजौ, नवमै म्हनै च्यार॥

आज रचाई हाथां मैंदी, घणौ कियौ सिणगार।

सोभालालजी दीनौ रुपियौ, देस्यूं भर-भर प्यार॥

जोबन झोला खाय सहेल्यां, सेजां करौ तयार।

पांच रुप्या सरपंचां दीना, होसी बेड़ा पार॥

थाणैदार सा दीनौ रुपियौ, बार-बार बळि जाऊं।

थै तो म्हारा सायबा, थांसू बातां करबा आऊं॥

निछरावळ रै रंग रा अे फटकारा इण भांत लागै जाणै अे ख्याल रा ई हिस्सा होवै।

अे ख्याल-तमासा फगत लोगां रा मन मीठा करनै मनोरंजन ई नीं करै, पण समाज में सुधार लाय नै मिनख नै आछौ बणावण री कोसिस ई करै। आंनै देख’र आपसरी में संप राखण री सीख मिळै अर आपसरा टंटा-झगड़ा मिटै। आंरै माध्यम सूं लोग आपरै धरम अर फरज नै ई ओळखै। मिनखपणै रौ आदर करतां थकां बडेरा जिण आदर्श री थरपणा करग्या—बीं नै जीवण में उतारबा री चेस्टा करै। आं सूं आपरी आस्था नै विसवास सूं जोड़ी राखण री प्रेरणा मिळै अर मिनख जमारौ सुधारबा रौ मारग सूझै।

कीं बरसां पैली तांईं ख्याल-तमासां रै प्रति लोगां में इतरौ उमाव हौ के गांव में नाई सूं लगाय नै सेठ तांईं; सगळा लोग ख्याल रौ मजमौ जोड़वा में लाग जावता। हर कौम इणनै आपरौ पवित्र फरज समझ’र ख्याल रौ रंग सवायौ करण में लाग जावती। पास पड़ोस रा गांव ख्याल देखवा नै उलट पड़ता अर खेल खतम होयां आपरै घर-गांव रौ गेलौ पकड़ता।

अबै थोड़ौ जमानौ बदळ्गयौ, सो ख्याल तमासां रै प्रति लोगां रै मन री भावना में ईं थोड़ौ फरक आयग्यौ। विज्ञान रै पाण सिनेमा इत्याद मनोरंजन रा दूजा साधन ई प्रयोग में आयग्या। छतांपण खेल-तमासां रौ आपरौ न्यारौ महत्व है। आंरी आपरी अेक सबळी परंपरा है, जिण आम आदमी रै दिमाग में आपरौ ठौड़-ठायौ बणायो है। लोग इण परंपरा सूं वाकब है। गांवड़ां में जठै हाल सिनेमा नीं पूगौ है, ख्याल-तमासा ई मानखै रै मनोरंजण रौ खास साधन है। अैतिहासिक अर धारमिक कथानकां माथै बण्योड़ा ख्याल आम आदमी नै आपरी सबळी परंपरा सूं जोड़’र सही मारग माथै चालण री प्रेरणा देवै।

सिनेमा रै इण जुग में केई ख्याल-मंडळियां आज ई इतरी सक्रिय अर सजीव है के अेक दाण तो वे आपरै सांमी सिनेमा नै ई चकरी खवाय दे। केई नुंवै कळाकारां अभिनय रा छेत्र में नुवां प्रयोग ई किया, पण अनुभव री कमी रै कारण वांनै जितरी सफळता मिळणी चाहिजै, उतरी नीं मिळी। अबै होळै-होळै गांवड़ां में ईं सहैरी हवा आय रैयी है तो बदळाव तो आवणौ ई है। पण बदळाव जे समझदारी सूं आवै तो समाज नै फायदौ होवै।

आ बात ई नीं है के ख्यालां रा उस्ताद ठेट सूं चलती आई लीक माथै ई चाल रैया है। पुष्कर में म्हैं देख्यौ के उगमराज ‘महाराजा प्रताप’ अर ‘पिरथीराज चव्हाण’ दो नुंवा खेल खेल्या। दोन्यूं खेल खासा सफळ रह्या। आं खेलां रा रचियता श्री जगन्नाथ राव सूं ईं म्हारौ उठै मिळणौ होयो। वां कैयी के जिकी ख्यालां री जूनी परंपरा चालती आय रैयी है, बीं री मूळ आत्मा कायम राखतां थकां जे नुंवा कथानकां माथै आधारित कोई नुंवी चीज देवां तो धनाधन चाल सकै।

उगमराज रा तो दोन्यूं तरै रा अनुभव हा। उण दिल्ली में परंपराऊं अर नुंवी दोन्यूं चीजां पेश कीधी। पण वांनै खुदनै अर देखण-वाळां नै जिकौ आणंद परंपरागत चीज में आयौ, वा नुंवी में इतरौ नीं आयौ। ईं फरक नै हर कोई नीं जाण सकै।

अपरंच ओ संतोख है के राजस्थान रा ख्याल बिखराव री हालत में नीं है। हाल ई वां में कसाव है, आपरी परंपरागत विशेषतावां है, जिणां रै पाण दरसकां रा मन नै बांध’र राखै। तीर हाल बीं सागै तरकस में ई है। वांरै रगत नै तेजी देवण री, समझण री अर सरावण री सख्त जरूरत है।

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थांनी मासिक) ,
  • सिरजक : महेन्द्र भानावत ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकाशन ,
  • संस्करण : अगस्त 1983
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