बोरुन्दौ, मंगलवार 5 अगस्त, 1987
प्रिय सी. पी. बना,
‘पागी’ रै पूठै दस बरस उपरान्त ‘कावड़’ राज री दूजी पोथी। ‘पागी’ में अट्ठाइस कवितावां ही अर ‘कावड़’ में चाळीस। बरसां रै लेखै कवितावां अंगै ई कम लिखीजी। ‘कावड़’ टाळ कीं छुट-पुट दूजी ई कवितावां व्हैला—तीसेक। लेखौ सुभट है—दूजै मास नीठ अेक कविता। साठ दिन बोळा व्है। अेक रुत ढळै अर बीजी बावड़ै। अमाठ तावड़ौ अर अमाठ चांदणी। हर छिण सांस—कांईं जागतां अर कांईं सूवतां। सांस में रांझौ पड़्यां, जीवण रौ सेड़ौ। कित्तौ कांईं खायौ व्हौला, पीयौ व्हौला। चाल्या व्हौला। हंस्या मुळकिया व्हौला। सपना दीठा व्हौला, कित्ती-कांईं वंतळ करी व्हौला-कांम री, बेकांम री। कित्ती-काईं चाय चूंपी व्हौला, सिगरेटां फूंकी व्हौला। पांन चाब्या व्हौला। पण कविता साठ दिन अर साठ रात उपरान्त फगत अेक। कीकर आंसिग्यौ, कीकर मन लाग्यौ? थोड़ी-घणी अमूझणी के जूंझळ तौ आई व्हैला? कवि नै कविता रचियां टाळ कीकर पोसावै? बाकी किणी कांम में नागा नीं, फगत कविता रचण में नागा। लगैटगै राजस्थांनी लेखकां रौ औ ई ढंग-ढाळौ। कदास इण सूं ईं माड़ौ। म्हारी जांण में अजगर ई इत्तौ ओजौ नीं ताकै।
राज रै ओळावै म्हैं राजस्थान रै तमाम लेखकां नै औ लेखौ बतावणी चावूं। जिणरा जैड़ा लोतर, जैड़ौ हाजमौ—उणी गत राजी-बेराजी व्हैला। रांणीजी रूठ्यां आपरौ सुहाग राखैला।
आप सू वत्तौ कुण जांणै के म्हैं फगत गिणती रौ महातम नीं दरसावणी चावूं। पण गिणती, गिणती री ठौड़ तौ ओपै इज है। बाकी सै बातां में तौ मिनख गिणती टाळ पावंडौ ई नीं भरै, पण साहित्य अर कळा रै सीगै गिणती रौ मपीणौ अगै ई नीं मांनै। सगळां नै जमीं-जागा गिणती रै मापै वत्ती चाहीजै। वित्त-सम्पत वत्ती चाहीजै—अकूंत। ठरकौ वत्तौ चाहीजै, नेपै वत्ती चाहीजै। आंमद वत्ती चाहीजै। ऊमर वत्ती चाहीजै। सत्ता वत्ती चाहीजै। नामूंन वत्ती चाहीजै। सरब मांनखौ गिणती रै बधावा खातर आठ पौ’र बत्तीस घड़ी फांफां मारै। फगत कविता अर साहित्य रै लेखै गिणती रै मपीणै माथौ धूणै। आ इज उगीणी दुभांत म्हारै हीये साल्है। गुण टाळ गिणती आंधी-गूंगी अर गिणती टाळ गुण पांगळौ। भपौभप मेळ टाळ कीं जुगत नीं बणै। मापा रौ मसालौ व्हियां ईं तेवड़ सस्वादौ लागै। नामूंन रै छोगै खरा अर निगोट सोना रै तुस री गूंजी संतोख नीं व्है। सौ टंच सोनौ जित्तौ वत्तौ व्है, उत्तो ई मन हरखै, मलापै। इणी भांत सांतरी कवितावां जित्ती वत्ती व्है, उत्तौ ई आछौ।
पण औ आछापणौ आवै कीकर? आ इज तौ मोटी आंटी पजै। अर इण आंटी रौ उकरास ढूकै के लेखक अर साहित्य रै माहौमाह गनौ, नातौ के सनातन कांईं? सनातन गाढ़ौ तौ साहित्य ई गाढ़ौ। सनातन सावकौ तौ साहित्य ई सावकौ। आपरी कूख रौ व्हियां मतै ई हांचळां पांनौ आवै! जिनावर ई वांरै खपतां दूजा बचियां नै नीं हेजै। नाड़ नातौ नीं तजै। पण स्वारथ में कळीज्यां नीं नाता री कांण राखीजै नीं गोत री अर नीं पूत री। स्वारथ मिनख रौ मोटौ दोखी। नीं सनातन पाळै अर नीं गनौ। स्वारथ तज्यां भाई सूं वत्तौ सैण नीं अर स्वारथ भज्यां भाई सूं वत्तो बैरी नीं। पछै स्वारथ में लथपथ व्हियां कुण कविता के साहित्य री मरजाद राखैला?
सुकरात री मिसाल समझायां सै मरम आपै ई सुभट व्है जावैला। विस दिरीजण री पूरमपूर सोय व्हियां ईं सुकरात रै हीये अंगै ई हींगापाई नीं लागी। उठी अेथेंस राज री परघे सुकरात सारू विस री त्यारी में रूधोड़ी ही अर अठी औघड़ सुकरात संगीत री नवी धुन सीखण में मगन हौ। नित नवौ ग्यांन ई सुकरात रै जीवण रौ सार हौ। मरण रै छेहलै छिण तांईं वौ इण सार री सोय सूं नीं टळ्यो। ग्यांन रै अबखै मारग टाळ वौ दूजी संवळी पगडांडी जांणतौ ई नीं हौ। जद इज तौ विस पीयां रै उपरांत ई वौ ग्यांन री लवल्या सूं नीं चुल्यौ। बोलिजियौ जित्तै बतावतौ गियौ के उणरै डील विस रौ कठै-कांईं असर व्है? वांणी रूंधिज्यां सांनी रै समचै समझाइस चालू राखी के उणरै अंगां विस रौ कठै-कांईं परचौ है? सुकरात रै खोळ्ये ग्यांन री औ सनातन हौ। वौ कित्तौ जीवै, कीकर जीवै, कठै जीवै, कांईं खावै-पीवै, बिछावै-ओढ़ै- आं सवालां रै पेटै उणरी जांण में कीं पड़ूत्तर नीं हौ। पण वौ क्यूं जीवै—इण इकडंकी सवाल रौ उणरै रूं-रूं सुभट पड़ूत्तर हौ के फगत ग्यांन री खातर। गुजरांण सारू ग्यांन नीं हौ, ग्यांन अर फगत ग्यांन सारू गुजरांण हौ—माड़ौ-मीठौ, दोरौ-सोरौ, अबखौ-अंवळौ गुजरांण। पगां उरबांणौ घर अंगां फाटोड़ा गाभा। भलांईं सियाळै सी पड़ौ के ऊनाळै तपत। वै ई गाभा अर वौ ई पूर। पण ग्यांन रौ अेकल अवधूत! ग्यांन अर फगत ग्यांन ई उणरै जीवण रौ अरथ, सार के म्यांनौ हौ।
लगतै डांव पाणिनी री मिसाल देवण रा उछाव माथै आंकस राखणौ म्हारै बस री बात कोयनीं। वन में गहर-घुमेर रूंखां री छींयां पाणिनी आपरै सिखां नै सबदां री उतपत (व्युत्पत्ति) समझावतौ हौ। के अणछक सिखां री कूंपळ अेक अचीती बो आई। अठी-उठी जोयौ तौ बाघ निगै आयौ। सगळा सिख अेकण सागै बोल्या—व्याघ्र.... व्याघ्र.... व्याघ्र! पाणिनी सोच्यौ के व्याघ्र री उतपत जांणण सारू ग्राखता दीसै। उणनै तौ ग्यांन री बो टाळ दूजी बो आवती इज नीं ही। ग्यांन टाळ परझळतो सूरज ई निगै नीं आवतौ। वौ अजेज व्याघ्र री उतपत समझावण लागौ। सिख हळफळाया होय वळै खरायौ—व्याघ्र... व्याघ्र! सेवट अबूझ गरू कीं चेतौ नीं कर्यौ तौ सगळा सिख आप-आपरौ जीव बचावण खातर झटौझट बांदरां री गळाई रूंखां चढ़ग्या। अर उठी वांरौ अबूझ गरू तौ व्याघ्र री उतपत समझावण में ई मगन हौ। बाकी सै बातां उण सारू असूझती ही। पण सिखां री गळाई बाघ नै तौ सुभट दीसतौ हौ। वौ सलबै आय आपरा भख रै हत्थळ मारी जित्तै पाणिनी व्याघ्र री उतपत समझावतौ रह्यौं अर व्याघ्र उणनै खायग्यौ। जीव में जीव हौ जित्तै बावळौ गरू व्याघ्र की उतपत समझावण में कीं खांमी राखी नीं अर उठी बाघ ई उणनै खावण में कीं पाछ राखी नीं। ग्यांन री खातर पाणिनी रौ जीवण तौ सुफळ हौ जकौ हौ इज, पण अंत समै उणरी मौत ई सारथक व्ही। अैड़ी सभागी मौत किणरा भाग में लिखी? मरै तौ अेक दिहाड़ै सगळा ई है, पण सुकरात अर पाणिनी री मौत जैड़ौ अमर छोगौ तौ किरोड़ां में किणी अेक रै माथै बंधै।
सी. पी. बना, थांरां सूं कांईं अछांनी के म्हारै जीवण अर साहित्य रै गना सारू म्हनै जांणै जित्तौ मोद हौ, पण सुकरात अर पाणिनी रौ अैड़ौ सभाग पतवाण्यां म्हारौ सै मोद झड़ग्यौ, सै गुमांन ढोळै बैठग्यौ। सुकरात अर पाणिनी जैड़ा अवतारी मांणस तौ जुगांनजुग कोई बिरळा ई जलमै। पण उणी सांयत पोथी रै आखरां रौ भुरट पैली वळा काळजै चिप्यौ, सौ हाल घड़ी-घड़ी रड़कै। उण वेळा-पुळ सावळ सोय व्ही के फगत बारै गाभां रै ई भुरट नीं चिपै, आतमा रै किणी अदीठ पसवाड़ै ई भुरट अैड़ौ चिपै के ताजिंदगी अळगौ नीं व्है। आतमा रै पसवाड़ै अैड़ा भुरटां री अबखी रड़क ई जीवण रौ साचेलौ आणंद है। सरत बाबू, गरुदेव अर चेखोव रै आखरां-दर-आाखरां अैड़ा अणगिण भुरट म्हारै अंतस चिप्योड़ा है। सुकरात अर पाणिनी री खोड़ खुड़ावण जोग तौ म्हारै जैड़ा हजार जलम ई थोड़ा, पण वैड़ौ सपनौ जोवण में कांईं वांदों। दीसै जित्तै सपना माड़ा क्यू जोवणा?
अै दोनूं ख्यात बांच्यां रै उपरांत कुण लेखक कांईं लिखै, कीकर लिखै, कद लिखै, कित्तौ लिखै—आं सवालां खातर म्हारी दीठ फुतरका जित्ती ई कांण कोनीं। क्यूं क्यूं अर फगत क्यूं रौ सवाल म्हारै कांनां धावड़ै। जीवण खातर लिखै के लिखण खातर जीवै। जस, नामूंन, नांणा अर स्वारथ रौ पेटौ पूरण सारू लिखै के फगत लिखण सारू ताखड़ा तोड़ै। साहित्य अर फगत साहित्य ई उण सारू धरम, देस अर भगवान। म्हारै पाखती तौ आज-कालै गैली—गूंगी सीख रा अै सबद है, आ ई वाणी है। मांनौ तौ रावळी मरजी अर नीं मांनौ तौ रावळी मरजी। कदास थांरै ओळावै म्हैं आपौआप नै मनावणी चावूं, समझावणी चावूं!
‘पागी’ रै उपरांत ‘कावड़’ री कवितावां खातर छेबासी देवणिया घणा ई लाधैला, क्यूं के वांनै खुदौखुद सारू ई इण गत मोर थापणियां री दरकार है। पण म्हारै उनमांन बाड़ी सीख देवणियौ सपनै ई नीं दीसैला। गोळी मारणिया बिचै ई खोटी सीख देवणियौ बेजां व्है। वगत परवांण पाटी पढ़ायां, घड़ी-घड़ी घोदायां सरकस रौ चात्रंग बांदरौ ई फटफटियौ चलायलै। प्रचंड हाथी तिपग्गा माथै ऊभ जावै, च्यारूं मेर घूम-घूमने सूंड मूं सिलांम करलै, तद मिनख सारू कविता, नाटक, बात, उपन्यास के आलोचना लिखणी कांई दूभर? ‘रावत मिष्ठान्न’ के ‘रावत होटल’ री ठौड़ लेखक रै ओलावै कोई रावत पंसारी साहित्य रौ रुजगार करै तौ कांईं अछेरी बात?
साच मांनौ सी. पी. बना, म्हारै वेताछीलै अंतस केई वळा अैड़ा अपरोगा सवाल खदबदै के कांई चोरी, जारी अर हित्या री गळाई साहित्य नै अपराध मांन्यां कित्ताक लेखक कलम थांमणं री आंट पाळैला, लिखण रौ सुभाव पोखैला? उण वगत साहित्य रौ रुजगार करणिया पंसारी तौ किणी गळी-कूंचै सोध्योड़ा ई नीं लाधै। जे कोई अरबां-खरबां रौ धणी अणपढ़ मायापत औ फरमांण काढ़ै के देस रा लेखक, इकबार-नवीस के कलावंत लिखण, गावण अर कोरण रौ हुनर सदावंत फिटौ करै तौ वांनै आप-आपरै कणूकां-परवांण पांच, दस के बीस हजार रिपिया महीनै दीठ मिळयां जासी तौ किताक अवधूत लिखणौ, गावणौ, कोरणौ के इकबार काढ़णो चालू राखैला। म्हारी जांण में सात पीढ़्यां तांईं साहित्य के कळा रै सीगै आखड़ी नीं झेलै तौ अपांरै देस भारत रौ नांव फिराय दूं।
रूप अर जोबन रै रूजगार बिचै ई आखर अर कळा रौ रूजगार घणौ खोटौ। क्यूंके मर्यां उपरांत किणी ‘सती-साधवी’ लुगाई सूं आपरै डील आंगै रूप रौ रूजगार भवै ई नीं व्है, पण लेखक रै सौ बरस पूग्यां आखरां रौ रुजगार तौ अखै रैवै। आखरां रौ इमरत ई निरवाळौ व्है अर आखरां रौ विस ई निरवाळौ व्है। इमरत बिचै ई विस रौ रुजगार घणौ सांतरौ चालै। अर चालै ई दाछंट!
टाबरपणै, खेल री गळाई कविता के बात लिखण सारू मन ताखड़ा तोड़ै, पण टाबरां री वै रचनावां खेल रै उनमांन ई निरदोस अर पालर व्है। सेवट समझ वापर्यां, स्वारथ रै हल्लै लाग्यां, आखर-सबदां रौ औ रुजगार जेब काटण बिचै ई वत्तौ मलीच है। जेबकतरौ तौ फगत जेब ई काटै पण सबदां रौ पंसारी तौ आतमा रै चीरौ लगावै, अंतस उगटावै। भावी पीढ़ी रै काळजै काळम पोतै। नांणा री ठौड़ चरित्र रौ हनन करै, सुभाव नै माळै मेलै।
आतमा रा खोज मेटै। पूंजी रै धूंसै जद सांच, धरम, तीरथ, देवी-देवता, परमेसर ई नाचण ढूकै तद बापड़ो कलम रै आखरां कित्तौ-कांईं गाढ़! बिणज करणिया बिणजारा तेवड़ै तौ चांद, सूरज अर नवलख तारां नै आपरी पोटां भरलै। म्हारी आ बात अखरै जांणौ सी. पी. वना, के जठालग पूंजी रौ पापौ नीं कटै, आखर-सबदां रौ मलीच रुजगार किणी तिरसिंघजी रै ढाब्यां नीं ढबै। कबीर, मीरां अर गरूदेव जैड़ा अवतारी तौ जोबरला ई जलमै, ज्यांरौ अंतस पूंजी रै कांमण नीं विटळै। पण जोबरला सपना जोवण री आस तज्यां तौ मिनखीचारा रौ अंस ई लोप व्है जावैला। जणा-जणा री कावड़ रै सुरंगां चितरांम कालस ई काळस धुल जावैला। पूंजी री भुरकी अैड़ी इज नीं व्है—कबूड़ां धुराधुर नै मांस हिलायदै। सौ खतां री अेक फारगती के नित-हमेस बासी मूंडै आपौ-आपनै सात वळा औ सवाल बूझौ के म्हैं क्यूं लिखूं, क्यूं लिखूं? जिणरौ जैड़ौ डोळ व्हैला, इण सवाल रै दरपण वैड़ौ प्रतम मतै ई दीस जावैला। भूमिका रै सीगै म्हारी आ भुळावण नीं भूल्या तौ साचांणी राज री कलम सूं स्याही री ठौड़ दूध रिसैला। थांरै अंतस म्हनै वैड़ा कणूंका सांप्रत दीसै। इण सवाल रै आगै बाकी सै सवालां री गुळगांठां मतै-मतै खुल जाबैला के कांई लिखूं। कीकर लिखूं? वेद, पुरांण, उपनिसद, महाभारत, रामायण, सूर, कबीर, मीरां इत्याद रा इमरत आखर इण ‘क्यूं’ सवाल रा ई पड़ूत्तर है। लारै जावतां गरूदेव रविबाबू रै आखरां-दर-आखरां इण सवाल रौ सासतौ म्याँनौ लाधै—हेरण वाळी आंख्यां री जोत-परवांण।
पगां हेटली जमीं जिण भांत निजर नीं आवै, उणी भांत ऊमरै-ऊमरै झोला खावतौ लोक-साहित्य आज रै भण्या-पढ्या गिटपिट लोगां री दीठ निगै नीं आवै। बूंटै-बूंटै अमोलक मांणक-मोती जड़्योड़ा, जकौ काच रै नाकुछ अंटां पेटै वोळाइजै। किण आगै कूकां, फरियाद करां? आज जैड़ा आंधा, बोळा घर पतबायरा धणी-धोरी तौ कदै ई नीं व्हिया। धकै री धकला जांणै। इण रुळपट अर लफंगा राज रौ आंकौ आयां ई धांमलौ मिटै तौ मिटै, दाझ ठरै तौ ठरै।
लोक-साहित्य रै अथाग दरियाव जकौ बन्दौ खोजैला, गण्टौ बीड़ैला उणनै धोबां-धोबां अमोलक मोती लाधैला। कित्ता ओखांणा, कित्ता गीत, कित्ती आडियां, कित्ता आख्यान अर कित्ती बातां इण अमाठ समंदर री छौळां-दर-छौळां दमकै। सी. पी. बना! थां मोट्यार-कवियां री आंख्यां चांनणौ के दोनूं हाथां आं अमोलक मोत्यां नै भेळा करण सारू पाछ मत राखजौं, मतै-मतै कबीर मीरां री कड़ियां थांरै गळै गुणमुणावण लागैला। थांरौ ‘पागी’ हाल तांईं किण री कांईं खोज हेरै? क्यूं ऊजड़ भटकै? अेक छिण रौ ई अबेलौ मत करौ अर लोक-साहित्य री इण अमोलक खांन नै अजेज उकराळौ। विस्वास नीं व्है जैड़ा नगीनां रा थर पाथर्योड़ा! लेखक रै मोट्यारपणा री पौच तौ पचासां ढल्यां राचै! नित-नवी भणाई रै भरम औ विस्वविद्यालयां रौ अग्यांन तौ अपांरै देस रौ नांवगौ ई उठाय देवैला। आज इण आधुनिक विद्या रौ ई परताप के सिरैपोत परदेसी, भारत रा भण्या-पढ्या मिनख ई है—जका मोटै नगरां कळबळै। पूंजी रै पांगरता बिणज सारू अै इकबार, अै कारखांना, अै दफ्तर, अै आयोग, अै आयोजन, अै भासण, आ भीड़, नै विस्वविद्यालय, अै प्रकासक, अै पोथ्यां, अै फिल्मां अर दूर-दरसण रौ औ फूहड़ चाळौ हदभांत जरूरी। जिण भांत बकरा नै हलाल करण सारू छुरी अखरै, उणी भांत पूंजी रै बधापै परम्परा नै मेटण खातर कमाई रै निमत आ आधुनिक विद्यां अखरै। अग्यांन रै अंधारै, ग्यांन रो औ भरम जरूरी। सी. पी. बना! अेम.एस.सी. रै उपरांत थें ई सेवट डाक्टर बणग्या, पण इण भणाई नै भूल्यां टाळ थें साचैला ग्यांन रौ झबकौ ई कांईं देखलौ? आये बरस अणगिण डाक्टरां री आ बधती हेड़ ई इण देस नै हेमाळै मेल्यौ-पछै इण भणाई रौ किणनै कांईं छिग बतावां? कविता, नाटक के बातां रै सिरजण पेट ग्यांन रौ औ भरम ई डाफाचूक करै। रांम जांणै इण अग्यांन री गूंजी कैड़ौ कांईं बिणज बधैला, विकास व्हैला? इण आंधी तकनीक रै सांचै कैड़ौ कांईं मांनखौ ढळैला? मसीनां रै बधतै कमियाळै री खटपट मिनख आपरी सुरपुर, आपरी मुळक अर आपरी गुणमुणाट ई पांतरण लागौ। कबीर जैड़ा औघड़ अेवाळिया टाळ इण लांठै अेवड़ री छाळीनार्यां सूं रिंछा खुदौखुद रांम के रहीम रै परताप ई नीं व्है। वगत सर थांरी ठावकी कड़ियां याद आयगी
थारै तांणा नै पाछौ तांण कबीरा,
इण बेजा में पड़ गई गांठ कबीरा।
कबीरा रै बेजै उलझी गांठां नै खोलण सारू आज रै लेखक री जिम्मेवारी घणी-घणी बधगी। आपरी कलम रै आखरां नै अणुबम सूं टक्कर लेवणी है। फगत टक्कर लियां ईं परवार्योड़ौ नागासाकी रै कुरुखेत उणनै छेहलौ महाभारत जीतणौ है। नींतर सरब दुनिया, सरब मांनखा, सरब जीव जिनावर नै तमांम वनापाती रै पोखाळै, घड़ी-पलकां री जेज! लेखक री कलम अर उणरै आखरां रौ महातम किणी जुग अैड़ौ परगट नीं व्हियौ अर नीं व्हैला। पण पूंजी री पेढ़ी धरम, ग्यांन, विग्यांन, ईस्वर री गळाई लेखक री कलम उणरी भासा, उणरी वांणी अडांणै वोळायोड़ी है—घणी दोरी छूटैला। क्यूं के हाट, बांण्या अर बैरी सगळा अदीठ-सांम्हो दीसै तो वार करीजै। वै च्यारूं मेर चापल्योड़ा पण कठै ई निजर नीं आवै। सरब व्यापी पण अगोचर! पूंजी रै इणी परमेसर रौ छेहलौ संघार करणौ है—कलम रै कांमण, सबद अर आखरां रै परचै। तद लेखक कांईं लिखै, कीकर लिखै, कद अर कठै लिखै—आं सवालां सूं कांना-टाळौ करनै फगत अेक सवाल रै पड़ूत्तर सूं उणनै सदावंत जूंझणौ के वौ क्यूं लिखै? क्यूं लिखै?
आज रौ कवि तुक अर छंद रौ पेंखड़ौ तुड़ाय अजांण ई अतुकान्त अर अछंद रै खुड़कै झिलग्यौ, जिण सूं सोरै-सास छूटापौ नीं व्है। झिलग्यौ सौ झिलग्यौ। समाज रै वासी अर परंपरा सूं जुड़्या मिनख सारू रीत रै दांवणा टाळ गुड़कौ ई नीं लागै। वौ जूंनी रीत भांगै अर नवी रीत घड़ै। रीत, कुरीत अर अनरीत ई मिनख री पांखां अर पेंखड़ा दोनूं है। तुक सूं मुगत होवण री आफळ करी तौ आज रौ कवि अतुकांत रै पेंखड़ै फंदग्यौ। अतुकांत ई रीत बणगी। नायिका-भेद रै नखसिख अलंकार सूं अपचौ व्हियां स्वच्छंद प्रेम अर काम रौ कांमण उणरी कलम में उतरग्यौ। हाट-बजार री खपत सारू अै बाणियावटी गुर मतै ई प्रकासक अर लेखक नै ढाबलै। तद लेखक नै आपरै आपांण चौकस होय खुदौखुद सूं घड़ी-घड़ी औ सवाल बूझणौ पड़ैला के वौ क्यूं लिखै? क्यूं लिखै? फगत इण ‘क्यूं’ सवाल रै फुफकारता पड़ूत्तर में ईं उणनै आपरौ मारग हेरणौ पडैला। आडी-अंवळी पग-डांड्यां रै पांण भवै ई जातरा संपूरण नीं व्है।
पैला बणाव-सिंगार में लड़ाझूम नायिका रै ओळूं-दोळूं कवि परकमा देवतौ। अबै नागी, अधनागी अडोळी नार नै रगदोळ्यां टाळ लेखक रौ निस्तार कठै? पण थांरी सोजी नै अवस सरावणी पड़ैला के नीं थांरा पागी नै नारी रै इण नागै रूप री खोज ही अर नीं थांरी कावड़ में नारी रा अधनागा चितरांम ई है। इण खातर धिनबाद देवूं जित्तौ ई थोड़ौ। पण कांईं लिखौ, कीकर लिखौ री
चरड़-घांणी में वै ई बासी विसय अर वौ ई विरंगौ बणाव। रीत सूं लारौ नीं छूटै। अर औ लारौ जद इज छूटैला के थें कलम हाथ में झेल्यां पैली आपौआप नै बारंबार औ अेक ई सवाल बूझौ—म्हैं क्यूं लिखूं? म्हैं क्यूं लिखूं?
अर इण सवाल रौ पड़ूत्तर फगत कलम अर अकल री अटकळ सूं भवै ई नीं दिरीजै। इण सवाल रौ पड़ूत्तर आखी जूंण सूं दिरीजैला, आखा डील सूं दिरीजैला। आवगै अंतस दिरीजैला। तमांम आंतड़ियां रै आंटां अर हिवड़ा रै हिबोळां दिरीजैला। रगत चांम अर हाडकां सूं दिरीजैला। दिल अर दिमाग रै सांम्हेळै दिरीजैला। नैणां री जोत अर वांगी रै परताप दिरीजैला। जिण भांत इण सवाल रौ पड़ूत्तर कबीर दियौ, मीरां दियौ उण भांत आवगी जूंण रै आपांण दिरीजैला।
हाल थांरै सिरजण रौ सिरीगणेस ई व्हियौ, बाकी जूण कलम रै आाखरां री आरती उतारण सारू धकै पड़ी। अंगै ई अबेळौ मत करौ। वेळा-पुळ वायोड़ा ई मोती नीपजै। परतख मिळ्यां म्हैं घड़ी-घड़ी इण बात सारू घोदावूं के ग्यांन-विग्यांन री नवी-नवी पोथ्यां बांचणौ ई लिखण रौ दूजौ नांव है। थें बांचण रौ नित-हमेस नवौ-नवौ आणंद नीं उठायौ तौ थांरै पाठकां नै कीकर आणंद पूरौला? कवि के लेखक सारू रोटी, गाभा, मकांन अर हवा बिचै ई टाळवी पोथ्यां रौ ग्यांन जरूरी। जे अेक टंक ई रोटी खायां टाळ नीं सरै तौ नित बांच्यां टाळ कीकर सरै? थें कवि हौ—म्हारै अनुभवां री इत्ती सीख ई मोकळी। इण सूं वत्ती झिकाळ नीं म्हनै छाजै अर नीं थांनै। सांप्रत मिळ्यां आ इज सीख अर परपूठ कागद मे आ इज पाटी! हां-हूं तौ हमेसां करौ, पण मांनौ कोनीं। इण में हांण म्हारी नीं आपरी इज है। जे औ कागद अर आ सीख भूमिका री गरज पाळै तौ छाप दीजौ, नींतर खैर-सल्ला। म्हैं मुळगौ ई भूंडौ नीं मांनूं—म्हारा सूं बेसी आ बात थ जांणौ। थांनै इत्ती भुळावण देय सीख करूं। हीये उतारण री जुगत विचारजौ, पछै थांरै जैड़ा कवि थें इज व्हौला!
थांरौ बिज्जी