पटा, परवाना, रुक्का, खत, पत्र आदि
राजस्थानी भासा रौ नाम लेवतां ही म्हारै निजरां आगै राजस्थान रो वो नक्सो आ जावै जिण में लाखों लोग आपरै टाबरपणै सूं लगाय बूढापै तक आपरी मायड़ भासा बोलता रैहवै, इण भासा रो नाम लेवतां वै पुराणा नाम याद आवै जिकां सूं भारत री संस्क्रति अमर हुई। वै है जांगळ देश, सपादलक्ष, कुरु, मत्स्य, शूरसेन, राजत्य देश, शिवि, मेदपाट, प्राग्वाट, बागड़, मरु, अर्बद, माड़, वल्ल, त्रवणी, गुर्जरात्र और माळव इण हिस्सौं सूं बणियोड़ौ राजस्थान री भासा राजस्थानी री परम्परा किती पुराणी व्हैला, आ बात अपणै-आप समझ में आ सकै। गुजराती साहित्य रा विद्वान झंवेरचन्द मेघाणी राजस्थानी भासा री परम्परा बतावतां कह्यो है के–
“इण जमाने रो पड़दो उठाय’र जे आप आगै चालौ तो थांनै कच्छ, काठियावाड़ सूं लगाय पिरयाग तांई पसरीयोड़ी अेक भासा निजरां आवैला…इण बोळचाळ री भासा रो नाम राजस्थानी है और इण सूं ईज गुजराती जैड़ी भासा रो जन्म हुवौ।”
केवण रो सार ओ ईज है कै भासा विग्यांन रा खोजी हिन्दी भासा री वंशावली खोजतां-खोजतां इण मुद्दै माथै पहोंच्या कै संस्कृत भासा भारोपीय परिवार सूं आयोड़ी है नै राजस्थानी, गुजराती, ब्रजभासा, भोजपुरी उणरी बेटियां दोहित्रियां ज्यूं फैलियोड़ी है। राजस्थानी भासा रो विस्तार सारै भारत में हो क्यूंकै लड़ायां लड़ता राजपूत जोधा अफगानिस्तान तक गया नैं बिणज करता बिणजारा आसाम-मद्रास तक जा रह्या, इण तरै बोलचाल नै कामकाज री भासा राजस्थानी संतों, भक्तों रै कारण लोक-भासा बणनैं आपरी परम्परा निभाई। भारत ऊपर शक, हूण, गुलाम, मुगलों रै लगातार हमलां सूं राजपूती शौर्य, त्याग, बलिदान री गाथावां आज जिकी इतयासां में पढण में आवै वै ही राजस्थानी भासा री परम्परा री माळा रा मिणिया है भलै ही इणरी सांगोपांग लड़ी बण नहीं पाई क्यूंकै जुंझारों रै लारै वांरी सम्पदा रा रखवाला कुण? धरम, संस्क्रती, प्रण, आन और सरणागतां री रक्सा खातर मौत सूं लोहौ लेवणिया राजस्थानी सुभटों री भासा रा रखवाळा तो इण भोम रा अै गढ़ नै दुरग, कोट, परकोट नैं ठिकांणा हीज है जिणमांय सूं राजस्थानी भासा री परम्परा सागर मांय सूं मोती बारै काढै ज्यूं बारै लावणी पड़ैला।
दुःख इण बात रौ है कै जिण राजस्थानी भासा री परम्परा ने सर जार्ज ग्रियर्सन नैं डॉ० सुनीती कुमार चटर्जी जैड़ा भासाविद् मांनी, उणरी परम्परा री अवमानता म्हारी आजादी रै पछै थापियोड़ौ राजभासा आयोग कीवी, जै उण सूं टकसाळी छाप इण ऊपर लाग जावती तो आ ई भारत री 14 भासाओं मांय सूं अेक मानेत भासा हुती नैं इणरै साहित री खोज रै साथै राजस्थांनी संस्क्रति नै वांरी परम्परा रो वैभव म्हारी राजस्थानी साहित्य अकादमी रै भण्डार में खचाखच भरियोड़ौ लाघतौ।
राजस्थानी भासा री बात करतां म्हैं म्हारै मुद्दै ऊपर पाछौ आ जाऊं कै राजस्थानी भासा री गहराई तो मेड़तणी मीरां बता गई पिण इण रै गद्य साहित्य री परम्परा तो म्हाने खोजणी ईज पड़ैला। गद्य रो पैलो नमूनौ चौदहवीं सदी में लिखियोड़ै ‘गोरख-पन्थी’ सम्प्रदाय रै ग्रन्थ में पढ़ण में आवै जिणरी लिखावट राजस्थानी हीज है, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल इण बात ने मानी है–
“श्री गुरु परमानंद तिनको दण्डवत है। है कैसे परमानंद आनन्दस्वरूप है सररी जिन्हको। जिन्ही के नित्य गायै तै सरीर चेतन्नि अरु आनन्दमय होतु है। मैं जु हौं गोरिख सो मछिन्दरनाथ को दण्डवत करत हो।”
आ गद्य परम्परा ख्यात, बात, वचनिका, दवावैत, पीढी, वंशावळी, पट्टावळी, हाळ, अहवाळ, हगीगत, याददास्त, विगत, तहकीकात, पट्टा, परवाना, खत, रूक्का, बही, रोजनामचा, टीकाओं, कथा, चरित, वर्णक ग्रंथों सूं चलती हीज रही है जरूरत है इण री खोज री जिणसूं कै वांरी लिखावट नै समां रै अन्दाज सूं गद्य परम्परा फेर थाप सकां। म्हैं पैलां ही बता चुक्यो हूं कै राजस्थानी गद्य री लिखावट कई रूपों में मौजूद है पिण म्हारो विषय है पट्टां, परवाना, रुक्कां, खतां सूं राजस्थानी री गद्य परम्परा बतावणी।
पट्टा –
राज सूं जागीर रा या जमीन जायदाद री मिल्कियत रा हथेरण री लिखावट।
परवाना –
राज रा हुकम।
खत –
चिठी पत्री, उधरत, भोगळाबो, डोण रा हथेरण।
रुक्का –
सरकारी चिट्ठी पत्री या हुकम।
पत्र –
विणज-व्यौपार रा समाचार या घरेलू चिठी, पत्री।
इणांनै इण हिस्सां में बांट सकां जिण सूं वांरी परख सही तरीकै सूं की जा सकै–
1.राजवर्गी
2.अर्धराजवर्गी
3.धार्मिक
4.पारिवारिक
राजवर्गी –
राजाओं रा हुकम, न्याय, दण्ड, शान्ति सुरक्षा री हिफाजती काम, मन्दिरों री रक्षा रा या फौज रा हुकम, जमीन जायदाद री मिल्कीयत।
अर्धराजवर्गी –
ठाकरों रा रुक्का, परवाना, (डोळी, माफी) रा पट्टा, खासा रुक्का, राज मेहकमा रा हुकम, अरजी, रपट, परचा।
धार्मिक –
मन्दिरों रा गुसांईजी रा खतो-खिताबत।
व्यक्तिगत पारिवारिक –
देस दिसावरों में रहता बोपारियां री चिठ्ठी-पत्रियां रेहण-भोगळावां, उधार, डौण रा लिखत रसीद, भाड़ाचिठी।
डॉ. टैसिटरी राजस्थानी भासा नैं साहित्य री वैज्ञानिक आधार सूं खोज करणिया पहला इटली रा विद्वान हा जिका सन् 1914 में उपर लिखिया मुद्दा सूं राजस्थानी री खोज करणी चालू की और वै जोधपुर में आय’र आपरो काम कियो नैं पछै बीकानेर जाय’र रह्या। डॉ. दसरथ शर्मा अेक जायगां लिखियो है कै “श्री टैसिटरी री अकाळ मौत नहीं हुती तो महाराजा गंगा सिंह जी री बखत राजस्थानी साहित्य रो भण्डार खूब भरीज जावतौ।”
डॉ. टैसिटरी अेक पट्टै रो नमूनो इण मुजब दियौ है जिको संवत् 1562 रो है, ओ राजवर्गी है–
पट्टा
ठीकाणो महाजन पटो गांव 135 रो लिखोजै तैं री विगत इण भांत छै–
“हमार ठाकर अमरसिंह जी ठाकर रै घरू पटै रा गांव 109 ठाकर बन्दगी में पोहता तैं सुं वधारै गांव 11 परधान ठाकरां रै अमरावत छै त्यांरै पटै गांव 15 इण मात्र पटौ तो गांव 135 रो लिखीजै परत पटैवां आबाद कमती छै तै री तपसील इण भांत ठां. डावी मिसल सीरै बैठ महाजन रो ठीकांणौ रावजी लूणकरण जी रै राज में बड़ा कदर रतनसींजी था ज्यौं नै अवल में ठीकांणा बंधायौ।”
अेक नमूनौ मकान रै पट्टै रो है जिणरी लिखावट सूं कानूनी बातां जमीन जायदाद री बिगत नै हकीगत नै पट्टै रा मालिक री पीढ़ी नै मिल्कियत रो हक कीकर मिल सकै आ समझ में आवै। इण तरै रा पट्टा कामकाज री भासा राजस्थानी रा अच्छा नमूना है पट्टौ लिखण रै पैलां राज रा ईस्टदेव रो नाम लिखीजै पछै इबारत लिखीजै–
संवत् 1853 रै जायदाद रै पट्टां री लिखावट–
“स्वारूप श्री अनेक सकल शुभ ओपमा विराजमानांत श्री राजराजेश्वर महाराजाधिराज महाराजा श्री 108 श्री भीवसिंह जी देव वचनात पाय तखतगढ़ जोधपुर में मोहल्लै खागळ ऊपर जायगा 1 खालसा री तीका पंचोळी हुकमचन्द रसकराय देवीचन्द सीवदास बुधराम बेटा पोतरा नुं ईनायत कीवी तिणरा माप री बीगत माप 1 लांबी गज 17।।। धुलंका नैं चौड़ी गज 16 उगण आथवण तीणरी मुकसरै गज 284 अखरै दोय सौ चौरासी, घर रो बारणो आथण सांमौ उण आगै मारग बहै ने पेसतां जीवणी बाजु तरफ दीखणांद किरायत माणकचन्द री जायगा नै पेसता डावी बाजु तरफ उतराद घरां रो नीकाळ नै पछीत तरफ उगवण वोड़ा रुघनाथ रो घर छै तींका जायगा नींव सीव असारा सुधी अबार तौ गजा सु तीणरो तालीको हुकम सूं कर दीयो दुबायती तीरवाड़ी कनीराम री विदमान सिकदार धांधळ उदेराम सुरतसिंघोत मुसरफ व्यास सुंदरदास जैकिसनोत”
संवत् 1853 रा मती असाढ़ वद 13 गुरुवार
संवत् 1880, 1897 में महाराजा मानसिंघ जी रै राज रा पट्टा, संवत् 1917, 1924, 1926 में महाराजा तखतसिंह जी री टेम तक पट्टा रौ इबारती परम्परा यूं री ज्यूं चालती रही।
परवाना
अै राज रा हुकम व्है जिणमें सरकारी अधिकारियां रै नाम इत्तळा व्है नै राज रा खास आदमियां नै किणी गांव, जमीन या हासळ वसूल करण रो हक दियो जावै इणां री लिखावट में ऊपर राज रै इष्ट रो नांम हुवै नै राज री मोहर रै नीचै परवाना री इबारत लिखीजै–
“स्वारूप श्री भीनमाल शुभस्थाने मोरा सीवराज जी युत सन्तोषचन्द जी जोग्य जोधपुर थी भंडारी लिखमीचन्द जी लिखावत जुहार बांचजो अठारा समाचार श्री…जी रा तेज प्रताप सूं भला छै थारा सदा भला चाहीजै। त्था थानवी बलदेव बलभदास रा नै प्रगना रा गांवों में खेड़ा दीठ रूपीयो 1) राक दीराबण रो हुकम हुवो है सु खेड़ा दीठ रुपीयो बरसा बरस दीराबो करजो श्री हजूर रो हुकम छै सं. 1894 रा।
सनद री नकल दफ्तर में उतराय नै पाछी सूंप दै जो।
द॥ दोढीदार रिणछोड़दास”
इण परवानां री भासा री विशेषता थोड़ै में सारी बात कैवण री चुतराई है– ज्यूं ‘खेड़ा दींठ’ ‘बरसा बरस’ साथै ही साथै रकम दिरावण रो, नकल देवण रो, परवाना सही आदमी नै सूंपण रो हुकम अेक साथ में लिखणे री खासियत ईमें व्है। राज री तरफ सूं जागीरदारों नै गांव री जागीर सौंपण रो भी परवानो हुतो–वां री लिखावट भी आपरी परम्परा राखै है बरसों बरस वांरी लिखावट रा मजमून अेक सांचै ढळियोड़ा ही हुवै। ज्यूं–
1. “श्री दीवांण लिखावतं प्रगना मेड़ता रा गांव धोंलराव खुरद तफै रैयां रा चौधरीयां लोकों समसत दिसे। तथा गांव थानवी सिंभुराम ब्रजलाल बगसीराम रा पटौ हुवो है सु सं. 1843 री साख सांवणु थां असल देजो–”
“सिंघवी श्री गभीरमल जी लिखांवत गढ़ जोधपुर रो गांव नांदीयो नरसिंघ रो रा चौधरियां लोकां दिसै। तथा गांव श्री दरबार में जबत है नै थानवी बलदेव ताळकै हुयो है सो इणांरै आदमी जाबतो करसी नै पैदास इणां रा रोजीना में दिरीज सी–”
इणीज तरैं संवत 1904, 1924, 1933 और आगै तक आईज इबारत परवाना में सिखीजती जिण सूं ठाकरां नै जागीर रो हक मिल जावतो अै परवाना वांरा खास हथेरण हा।
अर्ध राजवर्गी परवाना–
ज्यूं दरबार जागीरदारों नै जागीर में गांव इनायत करता नै वांरा परवाना जागीरदारों नै लिख देता उणीज तरै जागीरदार-ठाकर-उमराव आपरै गांव रा कीं खेत दान-पूण्य करता तो उण ‘डोळी’ री जमीन रो भी परवानो लिखीजतो। वां परवानां री इबारत रा नमूना–
“रावराजा जी श्री सजनसिंह जी कंवर जी श्री जवानसिंह जी सा वचनायत तथा थानवी बलदेव साळगराम रामदान दीसै तथा म्हारै पटै रो गांव सालोड़ी री सींव री जमीं हळ 8 आठ री म्हारै पड़दायत चनणाराय चलियां तरै पुण्यारथ दीवी है। सं. 1923”
खास रुक्का–
अै सन्देसा है जिका बराबरी रै ओहदेवाळां नै तथा आप सूं नीचै ओहदै वाळा नै सरकारी गोपनीयता राखता लिखिया जावता हा और वांनै राज रो खास विसवासु आदमी खुद हाथों हाथ ले’र जावता। यां री इबारत आपरी खासियत राखै।
1. खास रुको जोधपुर रा महाराजा श्री बिजैसिंह जी रो जैपुर रा सवाई परतापसिंह जी रै नांव रो। सं. 1834 रो।
“स्वारूप श्री राजराजेन्द्र महाराजाधिराज महाराज श्री सवाई परतापसिंह जी जोगराज राजेश्वर महाराजाधिराज महाराजा श्री बिजैसिंघ जी लिखावत जुहार बांचजो अठारा समाचार श्री…री दया सूं भला है राज रा सदा भला चाहीजै राज बड़ा हो अठा उठा रा बोहार में किणी बातरी जुदगी न है। अठै घोड़ा रजपूत है सो राज रा काम नु है अठीरी तरफ काम काज हुवै सो लिखाया करावसी। अपरच थांनवी सिंभुराम नूं मेलियो है सो समाचार जाहर करावसी कागद समाचार सदा लिखाया करावसी।”
2. खास रूका– दरबार रो खास आदमी बारै भेजियोड़ो खास सन्देसो भेजै इण में बडा आदमी छोटै आदमी नै लिखै आ इबारत और तरै री व्है। संवत 1839 में जोधपुर दरबार री तरफ सूं सिहाड़ बेठै सिंभूराम नै लिखीजियो–
“स्वारूप श्री थानवी श्री सिंभुराम जी जोग्य जोधपुर था प्रोहित केशोराम लिखावत पगेलागणो बांचजो अठारा समाचार श्री…जी रै तेज प्रताप सूं भला छै थांरा भला चाहीजै। अपरंच कागद थांरा आया दरसण कीयां रा वगेरै वीगतवार समाचार लिखिया थां सुं श्री हजूर मालम कीया फेर इणीज तरै वीगतवार समाचार लिखिया कीजो और गुंसाईजी श्री वल्लभजी भण्डारी वाळा रा रुपीया देणा तिण बाबत समाचार आगै थांनु लिखिया ईज है नै छह हजार रुपीया री हूंडी अठा सूं मेली थी सु थांनु पहुंची नहीं सुं कासीदां साथै रा कागद मारग में कोसीजिया तिण में वाई हूंडी गई हुसी तो हमैं उण हुंडी री पेठ लारां सूं मेलां हां सु करज रो जाब नवेड़ दीजो और उदैपुर सुं नाजर दरबारी अनकूट रा दरसण करण उठै आयो है नै तरवारां लियां हीज बैठक में बैठा रै है उठै ही प्रसाद लेवै सुं आ बात दुरस नहीं सो हुकम हुवो है दरबारी नु कह देजो सो हमैं उदैपुर परो जाय...।”
3. गुसांई जी रै भंडार रै जाबतै रो–रुको लिखणियो पगेलागणो जुहार दोनोऊ लिखै जद वो दूजी न्यात रो व्है। ओ रुको मोहणोत सवाईराम जी लिखियो इणमें बचावट, शांति-सुरक्षा री बात है–
“अपरंच श्री गोकुल श्री गुसांईजी महाराज रै भंडार किराणै वगेरै जिनस हजारीमल साथै मेली है सुं अणां नुं मारग रो आछी तरै जाबतो कराय दीजो सुं मारग में हासल मासूल री कठैई खेंचळ न करै नै जाबता सुं प्हांचै…।” सं. 1840
“अपरंच गुसांईजी श्री गोकुलनाथ जी महाराज रा आदमी आधा ब्रज में जाय छै सुं अै काम काज कहै सुं कराय देजो श्री हजूर रो हुकम है…।”
4. खास रुको – दरबार आपरै विश्वासपातर आदमी रै नाम खास रुको लिखता उण री इबारत–
“रुको थानवी सिंभु दीसै म्हारौ पगेलागणो बंचै अपरंच थारो मनै भरोसो है समाचार अठारा फरमाया माफक पंचोली जालमसिंह कै जीं माफक महाराज हजूर लाख बन्दोबस्त करावजो थे सुभचिंतक हो, म्हारो भलो चावो हो जीं माफक सुदारजो। सावण सुद 5”
राजकाज रा खत
राज रै काम में इन्तजाम, न्याय, कचेड़ी, दफ्तर, दण्ड, सिकायत रा खतों रा नमूना–
इन्तजामी खत–
“भाटी अरजनसिंह रौ पड़ियार माली नै हुकम ‘हाकम केणै मुजब बन्दोबस्त करै तो ठीक नहीं तो घोड़ा तीस ले नैं तू चढ जाई जै सुं सिव री कचेड़ी डेरा राखजै नैं आयसजी केवै जिण मुजब काम सारो करनै पाछो जाब लिखजै नैं अठा सुं लीखां तरै पछै आइजै।”
“खीची श्री रणजीतसिंह जी लिखावत गढ जोधपुर रो गांव चौपड़ा रा चौधरियां दिसै तथा साख सावणु रै जाबता सारू कणवारियों भेजियो है सुं जाबतो करजो।” सं.1936
धार्मिक खत–
गुसांईजी नै खत लिखण में अलंकारों वाळी भासा लिखीजती उणरो नमूनो–
“॥श्री 108 श्री बालकृष्णजी श्यामजी जयति॥
॥श्री 108 श्री गोकुलेसजी श्री 108 विठलेसजी साय छै॥
स्वस्ति श्री मद्वलभकुल कमल अमल अतपद पद पराग पल्लव आनंदतमत अलिदास से मनित वंदित वेसनवजन कुं बहुसुख दसरकः अैसी अनन्त ओपमा लायक गोस्वामी श्री 108 वृजाघीसजी श्री 108 श्री वृजपतजी महाराज चरण कमलेसुदासनुदास अनुचर चैना का कोटीन कोट दंडवत सष्टां मालूम होवै ह्यां आपकी अनुग्रहै सुं कुसल है श्री महाराज कै नितपृत कुसळ चाहते हैं अपरंच पत्र 2 आगै आप कुं दीना है ते सो पौंहचे होंयगे।”
इण खत री भासा भी गोरखपंथी सम्प्रदाय रै ग्रंथ री भासा ज्यूं राजस्थानी नै ब्रज रो मेळ री है। पिण आ है राजस्थानी क्यूंकै लिखावट में ‘छै’, ‘होवै’ राजस्थानी रा हीज है।
व्यक्तिगत या परिवार सम्बन्धी–
ज्यूं राजकाज रा, धर्म सूं सम्बन्ध राखणिया खत व्है ज्यूं अेक परिवार सूं सम्बन्धित खत भी व्है इणां मांय भाड़ाचीठी, भोगळाबो, उदार, डांण रा खत व्है नै पेटभरण सारू अरजी रपोटों भी व्है।
दरवार सूं मदद री अरजी—
“श्री श्री 108 श्री श्री हुजुर में सुभचिंतक थानवी सिंभुराम रा बेटा बलभदास री अरज मालम हुवै। तथा सिंभुराम चाकरी हो तिणरी हकीकत तथा गोडवाड़ श्री दरबार में लायो सुं आई तो श्री खावदा री तपस्या सुं नैं रुको 1 श्री बड़ा महाराजा जी रै हात रो नै रूको 1 राणां अलसी जी रै हाथ रो सुं अै रुका दोनु धाधळा रेकड़ीया रै पेशी रै ती तिण में है सुं श्री खावद बचावसी तिण में अै आखर है– लिखतु राणां अलसी तथा म्हारो जीव थानवी सिंभुराम रो राखिपो छै सिंभुराम तथा भाई बेटो अठै आवसी तिण नु मारो दीवान परदान बगसी पावै तिण माफक पावसी इण में जूठ हुवै तो इकलग जी वीचै है नै इण माफक श्री बड़ा महाराज जी दीयो तरवार 1 कटारी 1 मोतियां रो चोकड़ो 1 कड़ा 1 वींटी 1 नै पेला तो गांव लुणाव सीपो पटै थे नै पछै मैड़ता रो गांव धोळेराव हुवो नै रुपियो 1) जालोर री सायर सुं पावता सुं तो लारला दीनों में मोकुब रै गयो नैं हमै श्री खावद आपरो विरद वीचार मरजी आवै जिण माफक आजीवका कराय दीराईजो सुभचिंतक रै तो आसरौ श्री खावदा रो ही है।”
उधारी रो रुको–
इण लिखावट री भासा री आपरी खासियत है जिण सूं थोड़ै में घणी बात कहीज जावै नै अरथ रो अनरथ नहीं हुवै। ज्यूं–
“॥श्री रामजी साय छै॥
लिखतु परो चौथमल तथा मुता आसकरण जी रा रु. 25) अखरै रुपीया पचीस उदारा लीना तीण रो ब्याज पर 100॥) अखरै आना आठ लेखै भर देसों रुपीया मांगसी तरै ही परा देसों 1916 रा मिंगसर वदी 9
द॥ चौथमल”
डांण रो कारकूट–
कीं चीज अडांणै धर नै रुपीया उधार लेवै नै रकम पाछी नहीं दै सकै तरै अैड़ौ कारकूट लिखीजै–
“॥श्रीनाथजी॥
सेवगजी श्री छैलजी सुं म्हारो पगोलागणों वंचावसी बाळी 1 रु. 10। में डांण धरदी सो बाली म्हैं भर पाई। बाळी म्हारी राजी खुसी सुं थांनै दीवी। बतो गड़तो माल आपरो छै आई गई है।
माह सुदी 4 सं.1926
द॥ जोशी छैलै रा छै।”
हुंडी री चिठी–
किणी आदमी नै रुपिया दिरावण सारू किणी दुकांन रै ऊपर चिठी भेजै नै चिठी देखतां चिठी लावणियै ने रुपिया दीरीजै वेड़ो कागद हुंडी बाजै–
“॥परमेश्वरजी साय छै॥
स्वारूप श्री मूथा श्री बुधमल जी सूं डाळेथा रा किशोरसिंह लिखावत जुहार बांचजो तथा नानुराम जी रौ समां छै वो जिणरी चिंता हुई बिना जोर बात श्री जी सुं जोर नहीं नाजोर बात है और खरची सारू मदत में रू. 150) दोढ़ सौ री तौ चिठी करनै भेजी है सुं तापड़ियां री दुकान सुं उरा ले जो नै थे तुंरत आवजो।”
इणीज तरै री अरजियां, कोर्ट रा परचा, राज मे सिकायतों री लिखावट राजस्थानी गद्य में घणी सारी है। वांरो हवालो देंवता निरो टेम लागै इण वास्तै म्हारी बात इण विश्वास साथै मैं अठै ईज पूरी करूं कै राजस्थांनी गद्य री विधावां कोई आज नवीं नहीं इणां री परम्परा पुराणै टैम सूं चली आवै नै हाल तांई वांरा चलन है।
जै कोई संस्था जिणमें म्हांरो सुझाव तो राजस्थांनी शोध संस्थान चौपासनी रो ईज है, इण कांम नै हाथ में ले’र पूरो पाड़ै तौ राजस्थानी रै आदिकाळ री गद्य परंपरा आधुनिक काळ में किण तरै पसरी ओ मालूम व्है सकै।”