समाज अर मानखै रो आपस में चोळी-दामण रो साथ है। मिनख समाज में ही पैदा हुवै अर पनपै। समाज उण री जरूरतां नैं पूरी करै, उण री खूबियां सरावै अर उण री कमियां नैं कोसै। मिनख रो ओ पैलो फरज है कै बो समाज रै प्रति वफ़ादार रैवै अर पग-पग माथै उण री मरजादा नैं ऊजळी राखण रा जतन करै। सिक्षा रो सीधो सो अरथ है मिनख नैं चोखी अर हितकारी बातां री सीख या नसीहत देणी। सिक्षा बिना आदमी पूंछ-सींग बायरो पसु बाजै। इण ही कारण पढ़ाई री दुनिया में आद-जुगाद सूं पूछ रही नैं पढ़ियोड़ै रै च्यार आंख्यां मानी। दो आंख्यां सूं भी बराबर देखण री आसा की जावै तो च्यार आंख्यां वाळां सूं समाज जिम्मैवारी निभावण री दुगणी आस अर बिस्वास राखै तो वाजबी है।
सिक्षा रै साथ मातभासा रो मूंघो मेळ है, इण बात नैं संसार रा अनेक विद्बानां मानी है। सिक्षा अपणै आप में अेक आभूसण है नै मातभासा रो संजोग उण में अणमोल नगां रो जड़ाव है, जिण सूं धारण करण वाळै री घणी सोभा बधै। किणी भी प्रांत या देस री भासा जे घणी फळीफूली, बोहळै परवार री, मीठी, ओजस्वी नै लज्जतदार है तो उण री जड़ां में मातभासा रै सिक्षण रा संस्कार है। टाबर जिण तरै आपरी मां रो दूध चूंगतो उण रै अंतस रा भाव घणै कोड सूं ग्रहण कर नै उण री आज्ञा सब सूं पैली मानै है उणी तरै विद्यार्थी बाळक छोटी-मोटी बातां री जाणकारी सुरू में आपरी मातभासा में चावै। जे उण नैं बा भासा नहीं सिखाई जाय तो बो बिचारो उणी तरै बिलखो नै उदास रैवै जिण तरीकै मा-बायरो टाबर। बिना मा रा टाबर भी पड़ता-गुड़ता मोटा-मोटा होवै नै सोरो-दोरो आपरो गुजर चलावै पग बां रो अंतस घणो सूनौ। बां रै होठां ऊपर वा कुदरती मुस्कान नीं दीखै, बां री हालचाल में बा झूमती मस्ती नीं दीखै नै जद कदैई किणी मावड़ी रा लाडका आपरी मा री गोद में घणै हेत सूं लुटता दीखै उण पुळ बो बिजोगी बाळक ऊंडा निसासा नाखतो आपरी किसमत नैं घणो झूरसी। आ ही बात मातभासा रै सिक्षण री कमी सूं हर विद्यार्थी रै हिवड़ै में खटक रही है।
लोक में ओखाणो बैवै कै ‘ज्यांरा’ मरग्या बादसा (बै) रुळता फिरै वजीर।’ इण ही तरै धणियां तरै धणियां बिना धन सूनो बाजै। बिनां बेटां री मा तो जे रुळती फिरै तौ तकदीर नैं दोस दे पण घणा लाडकां री मावड़ी जे निरादर पावै तो उण में मा रै साथ-साथ दूणो अपमान उण रै छोरियां रो भी है। किणी देस री संस्कृति उठै रो साहित्य, बां री कळावां, इतिहास री अनूठी बातां नै उण सूं ही हियो पतीजै। यां बातां री वाकफी रै बिना आदमी रै मन में मातभोम अर मातभासा रै प्रति सम्मान री भावना पैदा नीं हुवै नै इण भावना रै बिना आदमी वफादार नहीं, देस रो गद्दार बाजै।
आ बात ही किणी देस या प्रांत री मातभासा रो महत्व प्रगट करण री, नै आज सवाल अड़ियो है उण राजस्थान में जिको जुगां सूं देस में दीपतो दीवो बणियो रयो। जिण प्रांत री अनोखी आन-बान अर मरदाई री मठोठ ही, जठै री राग रागणियां रा सुरीला गीत गगन अर धरती रै बिचै सदियां सूं गूंजता रैया, जिण रा चित-लुभावणा चित्रामां देस तो कांईं परदेसां तक रा संग्रहालयां अर राजमहलां रो रूप बढायो, जिण री मूरतकला रा नमूना जुगां पैलड़ा होतां हुयां भी आज रै विज्ञानी जुगां पैलड़ा होतां हुयां भी आज रै विज्ञानी जुग नैं अचंभै राख देवै, जठै री वीरांगनावां आप री औलाद नैं गुटकी रै साथै मातभोम री भोळावण देती नै सूरमा मरण परब मनावता, मौत नैं निमतरो देय काळ सूं ही विकराळ बणता अर जंग रा नगारा सुण ज्यां री नड़ी-नड़ी नाचती। अेक तरफ परणीजण रो प्रेम नै झिलती जोड़ी रा लाडकोड तो दूजी कानी मातभोम अर मरजादा री रक्षा रो सवाल। परणी रो पल्लो छोड झगड़ै री मस्ती में जाय घोड़ा झोकता नै मैड़ियां मांय सूं गोरड़ियां रो निरखणो, तो उठी सूरमावां रो बढतो जोस। सिंधू राग रा हबोळा नै धरती रो धमचक। हथळेवै में जुड़ियो हाथ सुरग में भी सतियां साथ नहीं छोड़ती। बा ही उण जिंदगी री झलक, जिण रा प्राणवंत चित्राम राजस्थान रै साहित्य में संजोया। घणै दुख री बात है कै बा भासा अर बो ही साहित्य आज बेकदरो होय रैयो है।
ऊजळी परंपरा नै अंजस री सगळी बातां नयी पीढ़ी रै उर में जद ही असर करैली कै वां रै सबूत नै प्रमाण रा गीत-दूहा मातभासा में ही पढ़ाया अर समझाया जावै। साहित्य रै छबकाळ दोस री तरै पराई भासा रै आखरां रो भेळियो अडोपतो दीखै नैं राजस्थानी जीवण रै भरम री बातां टाबरां नैं दूसरी भासा में पढ़ावणी, भासा में दोगलापणो पैदा करणो है। इण सूं राजस्थानी रसधारा ठंडी नैं फीकी पड़ जावै। बोलणै अर लिखणै रो प्रभाव नै प्रवाह जद तांईं ही सबळ रैसी जद कै आपां उण भासा रै लहजै में ही लगता बोलता रैवां। आज राजस्थानी भासा रो राजनीतिक मंच माथै कोई आसण नहीं है पण उण रो अस्तित्व नै असर तो कोई मेट नीं सकै। इण साहित्य रा नग-कणूका छोटी कक्षावां सूं अेम.अे. तांईं पढ़ाया भी जावै पण वा सिक्षा हिन्दी रै माध्यम यानी बिचावळै सूं समझाई जाय सो कम असर करै नै आगै विकास री कोई गुंजायस नीं दीखै। संस्कृत ग्रंथां री बातां आज रा पढ़ियोड़ां रै सारू कोरी परळां नै ठालेड़ बातां बण गई उण रो कारण ओहीज है कै प्राचीन संस्कृति रो ग्यान पिछमी आडंबर रै पळैटै सूं दियो जावै सो असर नीं करै। आज रो जीवण इतरो बदळ गयो है कै बै बातां कोरी बातां ही रैयगी। राजस्थानी भासा जे दिनोदिन अटक्योड़ी रही तो पढ़ियोड़ो समाज अठै री परंपरा सूं पलटो खाय परायो बण जासी। नयी जमात बढ़ती जावैली नै जूनी बातां अर बडेरां री धरोहर रा हिमायती बिरळा ही रैय जासी। इण तरै आपां रो साहित्य नै संस्कृति भविस्य में कोरी सोध अर संग्रहालयां रो मसालो मात्र बण जावैली।
कई लोग ओ संसय प्रगट करै है कै जे राजस्थानी भासा में सिक्षण री व्यवस्था सरू करां तो अेकरूपता नीं आय सकै। पाठ्य-पुस्तकां, व्याकरण, निबंध, कहाणी, आलोचना, उपन्यास इत्यादी री कद और कीकर पूरी हुवैली। इण सवाल नैं ध्यान सूं सोचै तो कोई मुसकल नीं है। किणी भासा में बोलियां अर उपबोलियां री बोहळाई तो उण री समृद्धी नैं अथग सबदसागर री सूचक है। साहित्यिक स्तर रो अेक मापदंड हुया करै है। आज जोधपुर, जयपुर, उदयपुर, सिरोही नै कोटा-बूंदी री बोलियां में घणो फरक है अर बो फरक थेटू ही हो। डिंगळ कवितावां में कोई फरक नीं दीखै। बूंदी रा कवि सूरमलजी मीसण ‘वीरसतसई’ में लिखै है–
काळी, चूड़ी की तजै मंगळ बेळा रोय।
रावत जाई डीकरी, सदा सुहागण होय॥
इण दूहै में आथूणौ असर है। जैसलमेर अर पिछमी मारवाड़ रो लहजो है जिको पुराणी नै टकसाळी भासा रो केन्द्र रयो है। आज भी राजस्थानी री अेकरूपता री कोसीस सफळ करणी है तो मारवाड़ री बोली नैं आधार बणांणी पड़सी। जूना अर कदीमी सबदां रो प्रयोग ज्यादा कियो जाय तो चोखो है। दूजी भासावां रा मिस्रित अर बिगड़्योड़ा सबदां सूं भासा री खूबसूरती मारी जावै। टकसाळी नै मुटकण सबद ही इण भासा री धाक जमाय सकै, चाहै बै ओज प्रधान हुवै या माधुर्य सूं सराबोर। जठै तांईं ‘म्हारै’, ‘थारै’ री जगह ‘म्हाणै’ ‘थाणै’ बोलीजैला तो आ भासा बुलंद अर अधिकार जमावण वाळी नीं बण सकैली। राजस्थानी भासा रो आपरो न्यारो लहजो है, जोसीला, रूपाळा नै घणा मीठा आखर है, अर इण री अनूठी ओपमावां है रूपकां रै साथै बोलीजण सूं इण री सोभा चोगुणी बढ़ जावै।
मातभासा नैं माता रो स्थान अंतःकरण है, सो उठै असर करण वाळी बात थेट काळजै री कोर सूं निकळियोड़ी आवाज ही होय सकै। आज भी राजस्थान रा घणकरा आदमी घर में मा-बाप अर लुगाई, टाबरां सूं राजस्थानी में बातां करै पण बारलो आदमी मिलतां ही खड़ी बोली में बोलणो सरू कर दैवै।
आज सूं घणा बरस पैली जोधपुर पंडित रामकरणजी आसोपा सबसूं पैली राजस्थानी भासा में प्राथमिक कक्षावां सारू पाठ्यपुस्तकां अर व्याकरण लिखी। पण बा तजबीज आगै पार नीं पड़ सकी, इण वास्तै नयै सिरै सूं कोई पोथी उण ध्येय रै खातर नीं लिखीजी। जिण भासा नैं दो करोड़ आदमी बोलै उण नै लिपिबद्ध करणी कोई मुसकल बात नहीं है। आज पाठ्यपुस्तकां री मांग निकळै तो महीनै भर में ढेर सारी पुस्तकां तैयार हो सकै। किणी चीज नैं उठावो दियां सूं ही बढ़ै है। यूं आज भी लोग आप-आप रै ढंग रा उपन्यास, कहाणियां अेकांकी, निबंध अर कवितावां लिखै हीज है। जिण तरफ बधारै अर तरक्की री उम्मीद कम होवै उठी नैं आदमी मैनत थोड़ी करै नैं तुरंत फायदो दीखै उठी नैं मानखो जादा झुकिया करै। कोई कमी नहीं है, कमी तो है मातभासा रै सिक्षण री।
जनता रै अंतःकरण री भावना की कदर करण सारू सरकार सूं इण तरफ मांग की जाय अर मातृभासा में सिक्षण चालू कियो जावै। आज भी पाठ्यपुस्तकां रा सब्दार्थ छोटी कक्षावां में अध्यापक राजस्थानी में समझावै, सो तरै इण भासा री जरूरत नै महत्व तो यूं ही प्रगट है। फेर पूरी तोर सूं नीं पढ़ाई जाय इण कारण अधकचरी कूलर बण जावै। न तो झटपट हिंदी रो पूरो ज्ञान हुवै अर न राजस्थानी री ही पूरी जाणकारी। विज्ञान री कक्षावां में सारो कामकाज अंग्रेजी में चलतो रयो सो सांइस वाळा हिंदी नैं नफरत री निगावां सूं देखता रया, पण ज्यूं ही बारवीं कक्षा तक हिंदी अनिवार्य रूप सूं पढावणी सरू की तो जाणकारी बढण रै साथै विद्यार्थियां में रुचि अर भासा रै सम्मान री भावना भी बढी। ठीक इणी तरै आज राजस्थानी साहित्य नै संस्कृति री बातां हिंदी रै माध्यम सूं नीं पढायजै उणी भासा में पढावणी सरू की जाय तो लोग रूचि बढावैला नै वातावरण बडो अनुकूल बण जासी। सिनेमां में कोरा उर्दू मिस्रित हिंदी रा गीत ही जमता रैया, पण ज्यूं ही ‘बाबोसा री लाडली’, ‘धणी-लुगाई’, ‘बाबा रामदेव’ अर ‘ढोला मरवण’ जैड़ी फिल्मां आई तो राजस्थानी गीतां री धूम सहरां री गळी-गळी में मचगी। जनता में राजस्थानी रै मिठास री खूबियां जतावण सारू फिल्मी संसार री मदद भी घणो कार करसी। जे कोई जमानै रो मोटो आदमी राजस्थानी में बोलै तो साधारण लोगां ऊपर घणो आछो प्रभाव पड़ै अऱ दूजा लोग भी उण तरफ मुड़ै। हीण भावना री जगां सम्मान री भावना बणावण सारू पढियां-लिखियां नै लिखणो अर बोलणो राजस्थानी में चाहीजै।
कोसीस कियां सूं हरेक चीज पनपै नै कामयाब हुवै है। राजस्थान री पवित्र संस्कृति अर ऊजळो आदर्स जे संसार में अमर राखणो है तो राजस्थानी भासा नैं सींचणी नैं पोखणी जरूरी है। इण री जड़ां मजबूत करण रै खातर, नै फूलां छाई राखण वास्तै घणो जरूरी है कै मातभासा में सिक्षण सरू करायो जावै। इण पंथ में कोई मोटा अभाव नहीं है। छोटी-मोटी कमियां आप सूं आप हटती जावैली। ईस्वर रो अनुग्रह नै सरस्वती री किरपा है कै आज अनेक विद्वान नै मातभासा रा सपूत लाडला इण री सेवा में कमर कसियां खड़्या है। साथ ही कवि-सम्मेलनां में जैड़ा सम्मेलन राजस्थानी रा जमै है बैड़ा हिंदी या उर्दू रा नहीं। इणी तरै अठै रा जूना नै हेताळू गीत पुराणी प्रीत जगाय देवै। चुणावां में भी नेतावां नै गावां री जनता रै सामनै राजस्थानी में ही बोलियां पार पड़ै नै रेडियो सूं ‘ग्राम संसार’ प्रोगाम गावां में घणै कोड सूं सुणिया करै। इण तरै गावां रो वरग तो राजस्थानी रै वळू है।
दरअसल राजस्थान री जनसता गावां में ही है। हमें ज्यूं-ज्यूं पढ़ाई रो जोर बधै ज्यूं-ज्यूं सहरां मिळता छोकरा आपरी मातभासा रा सबदां नैं भूलतां जावै नै खुद री धरोहर गमावता जावै है। इण तरै आ बढ़ती आबादी भविस्य में गळत रास्तै बुई जावैली सो पाणी पैली पाळ बांधणी जरूरी है। वा पाळ आ हीज है कै राजस्थान में हरेक प्राथमिक पाठसाळा में अनिवार्य रूप सूं प्रारंभिक सिक्षण मातभासा में ही दियो जावै ताकि कर्नल टॉड रा बखाण नै बडेरां री कीरती हरेक टाबर समझ सकै नै मोद अर अंजस रै साथ आप री मातभासा रो अणमोल खजानो रूखाळ सकै। हिंदी आपां री राष्ट्रभासा है, उण री जाणकारी भी जरूरी है। पण दूसरा प्रांतां में भी अै भासावां चलै है, साथ ही सब ठोड़ प्रांतीय भासावां रो विकास भी बढ रैयो है। इणी तरै आंपां रै अठै भी राजस्थानी में सिक्षण री अनिवार्य योजना लागू करणी घणी जरूरी है। स्वर्गीय नित्यानंदजी सास्त्री रै सब्दां में–
‘जब तक राजस्थान रहेगा, तब तक राजस्थानी।’ सो राजस्थान तो रैवैलो ही अर राजस्थानी भी रैवसी, पण वा किण रूप में रैवैली इण बात रो ध्यान राखतां हुयां ओ घणो जरूरी है कै आपां हर टाबर नै प्राथमिक सिक्षा राजस्थानी में ही देवां। ईस्वर सूं प्रार्थना है कै बो आपां नै इण पवित्र पंथ में मदद करै नै मातभोम अर मातभासा री सेवा कर उण री ऊजळी आसीस पावां, ओ हीज म्हारै अंतस रो हेलो नै लेखणी रो संदेसो है।