यह तत् वाद्य है। इसे 'वेणों' भी कहते हैं। इसे रोहिड़े की लकड़ी से बनाया जाता है। इसमें चार तार होते हैं और शक्ल तानपूरे के समान किंतु उससे कुछ छोटी होती है। इसमें चार तार होने के कारण इसे 'चौतारा' भी कहा जाता है। इसे कामड़ जाति के लोग अधिक बजाते हैं। कामड़ जाति की स्त्रियाँ जब ‘तेरहताली नृत्य’ करती हैं, तो उनके संगीत में तंदूरा, ढोलक और मंजीरों की संगति होती है। रामदेव जी के भोपे इसे बजाकर जम्मा देते हैं। तेरहताली नृत्य का यह मुख्य वाद्य ही है। संगत में करताल-मंजीरे-चिमटा आदि वाद्य काम में लिए जाते हैं। इसे उँगलियों में मिजराब पहनकर बजाया जाता है।
स्व. पद्माराम मेघवाल इस वाद्य पर भजन और बानियाँ गाते थे। राजस्थान में महेशाराम मेघवाल, बग्गा खान, बरकत लावा और मेवात में प्रह्लादसिंह टिपानिया इसके मुख्य कलाकार हैं।