चूरू-सेखावाटी हलकै री अलेखूं हवेल्यां भांत-भांत रा रंग मांडणा (भित्ति चित्रां) सूं सजी-संवरी हाल भी आपरै स्थापत्य रै कारण देसी-परदेसी पर्यटकां अर कला-पारख्यां रौ ध्यांन खींचै। खास करनै आं हवेल्यां रै रंग-मांडणा री चरचावां तौ मोकळी घरू नै पारखी पत्रिकावां नै पोथ्यां में हुई है। आं हवेल्यां में रंग-मांडणा जैड़ौ ई फूटरौ, चावौ ने कलात्मक काम काठ माथै भी हुयौ है, पण हाल-फिलहाल उण कानी भौत ई कम ध्यान दिरीज्यौ है।
गळी बैवता गढनुमा किणी टणकी हवेली रै पसवाड़ै कर निकळतां निजरां थोड़ी सी’क ऊंची करतां ई छोटा-मोटा जाळी-झरोखां सूं लड़ालूम आं हवेल्यां री ओप मतै ई मन नै बांध लै। जित्ता झरोखां री सोभा निरखतां हवेली रै सामै पासी आवां जणै जंगी पोळ आळौ सैंठौ दरवाजौ दो खिण रुक नै अतीत रै सामन्ती वैभव नै निरखण री मनुहार करतौ दीसै। पीतळ या लोह री पात अर पात्यां जड़ी ईं पोळ रै सिरै निजर आवै अेक सैंठो सैंतीर। पूरौ-पूरौ सैंतीर झीणी कोरणी सूं फबै। ईं रै सै सूं ऊपरलै चौड़ै पाट माथै बीचौ-बीच गणेशजी री मूर्ति खोद्योड़ी हुवै, जिण रै असवाड़ै-पसवाड़ै रिद्धि अर सिद्धि कुद्योड़ा है अर बाकी भाग माथै सोवणा वृत्ताकार फूल, जका कै ‘कंवळ-फूंबी’ साथै घणा फूटरा दीसै। सैंतीर रै ईं ऊपराळै भाग नै ‘सोबोटी’ कैवै। ईं सोबोटी रै नीचै ई निजर आवै मुर्गाबी रा ‘जळ-कूकड़ां’ री कतार। अेक-अेक कतार में बीस-बीस तीस-तीस जळ-कूकड़ा अर इस्या कूकड़ा री दो-दो तीन-तीन पांत। हर दो जळ-कूकड़ां रै बिचै लागी रैवै कंवळ-कूंबी। अैड़ी जित्ती पांत सै तीर माथै बण्योड़ी हुवै सैंतीर बित्तौ ई फूटरौ लागै। आं जळ-कूकड़ां री पांत रै हेटै चौड़ै पाट माथै भी भांत-भांत रा बेल-बूंटां री झीणी कारीगरी निंगै आवै। कुल मिला’र पूरौ सैंतीर इसौ ओपतौ दीसै के देखता ई रैवौ।
पोळी रै ईं दरवाजै रै बाद धोरी बाण्डै माथै भी इसौ-रौ-इसौ बल्कि ईं सूं भी इधकौ काम निजर आवै। धोरी बाण्डै री चौगट माथै ‘सोबोटी’ री बणगट पोळी आळै सैंतीर जैड़ी ई हुवै, हां ईं में घणकरी बार रिद्धि-सिद्धि नै टाळ’र खाली गणेशजी ई कोर्योड़ा हुवै। सो बोटी रै नीचै चालै ‘जळ-कूकड़ां’ री पांत। न्यारा-न्यारा दरवाजां माथै आं री गिणती अेक सूं लेय नै च्यार तांईं लाधै। यूं साधारण तौर माथै घणकरा मोडा माथै तीन पांत में ईं जळ कूकड़ा नै कंवळ-कूंबी रौ धारौ रह्यौ है। चौगट में जळ-कूकड़ां री जित्ती पांत उणरै असवाड़ै-पसवाड़ै उत्ती पाट्यां हुवै, जकी के ‘साख’ रै नांव सूं ओळखीजै अर आं पाट्यां रै लारै ई जोड़ी, दो साख, तीन साख के च्यार साख री बाजै। आं साख री पाट्यां माथै भी भांत-भांत रा बेल-बूंटा तरासीजै। कंवळ-कूंबी अर जळ-कूकड़ां री पांत रै नीचै चोड़ै सीरै माथै भळै न्यारी-न्यारी फूल पांखड़्यां नै बीचो-बीच आमै-सामै मूंडै आळा मोरिया मंड्या रैवै। ई सांतरी चौगट में इणरै जैड़ा ई फूटरा नै ओपता किंवाड़ लाग्योड़ा रैवै। साधारणत रूप सूं तौ अै किंवाड़ ‘बखरै’ रा किंवाड़ हुवै। पीतळ रा छोटा-मोटा फूल जैड़ी चकरियां नै बीच-बीच में राख नै घड़्योड़ा अै किंवाड़ घणा सोवणा लागै। ईं चौगट में कनै-कठै ‘बखरै’ री जोड़ी री ठौड़ बिलियां री जोड़ी भी लाग्योड़ी है, जियां के रतनगढ रै अग्रवाळां री धरमसाळा में। इण रै अलावा भी केई-केई हवेल्यां में ईं चौगट सागै ‘दलां’ री जोड़ी भी लाग्योड़ी है, जिण रै मांय देवी-देवतावां सूं लगाय’र पसु-पांखी अर फूल-पत्यां तांईं घणी मैनत सूं उकेरीज्या है।
धोरी बांडै री ईं जोड़ी री भांत ई किसी-किसी हवेली में बारली बैठक रा किंवाड़ अर खिड़क्यां माथै भी कोरणी रौ सांतरौ काम हुयोड़ौ है। सरदारशहर रा श्री मंगतमलजी दूगड़ री हवेली में अैड़ौ ई फूटरौ काम निजर आवै।
बारली बैठक रा किंवाड़ अर झरोखां सूं भी इधकौ रूपाळौ काम मोटा कमरां, तीबारा रा दरवाजा में लाग्योड़ी सैंतीरा माथै हुयोड़ौ है। आं सैंतीरां रै सारै वास्तै सेखावाटी चाल रा पत्थर रै टोडां जैड़ा ई लकड़ी रा टोड़ा लाग्योड़ा है। अैड़ां टोड़ा दो बंट रा टोड़ा कैयीजै। सैंतीर अर टोड़ां दोनां ईं रै तीनां पसवाड़ै न्यारी-न्यारी भांत री कोरणी री झीणी कारीगरी केई हवेल्यां में लाधसी। कठै-कठै सैंतीरा हेटला टोडां रौ साइज नै नकसौ छोटौ ने न्यारौ हुवै उण नै डेट बांट रा टोड़ा कैवै। अैड़ै कास खातर चूरू रै पोतदारां री हवेली, सरदारशहर रै जम्भड़ां री हवेली के दुग्गड़ां री हवेली देखी जा सकै है।
पोळ, धोरी बांडै अर बारली बैठक री जोड़्यां री भांत कठै-कठै परीण्डै री जोड़्यां माथै ई घणौ फूटरौ काम हुयोड़ौ है। परीण्डै री जोड़्यां में कठै तौ पूरै किवाड़ रै हरेक वळै माथै न्यारी-न्यारी भांत री जाळ्यां कट्योड़ी है अर कठै दलै माथै जाळी नै काट’र यूं ईं कोरणी रा भांत-भांत रा डिजायन मांडीज्या है। आं उल्लेखण जोग जोड़्यां रै अलावा घणकरी हवेल्यां में जिता भी किंवाड़ जाळी झरोखा है, बां सगळां री चोगटां माथै न्यारै-न्यारै डिजायन आळा बेल-बूटां उकेरीज्योड़ा है। यूं अेक-अेक हवेली में सैकड़ूं भांत रा बेल-बूंटा लाध ज्यासी।
दरवाजां, जोड़्यां अर सैंतीरा रै अलावा रोजमित्ति में काम आवण आळी मोकळी चीजां माथै कोरणी रौ फूटरौ काम मिलै। आरती रौ चौपड़ौ, अन्तरदान्या, सिणगार री पेइयां, बिलोवणां री नेर्यां, चोक्यां, बाजोट, ढोलियां रा पागा, पिलंग, पालणां, हीण्डा, कुड़स्यां, सिंहासण अर रथ नै बेल्यां तकात में लाग्योड़ी लकड़ी माथै कोरणी रै काम री चाल ही। आं सगळी चीज्यां में लाग्योड़ौ काठ रिपियै में नब्बै पीसां रोहीड़ै रौ काठ ई हौ। बाकी दस पीसां में सौसूं के सागवान री लकड़ी काम आयोड़ी है। आं सगळी चीजां खातर रोहीड़ै री लकड़ी बरतणै रा केई कारण। अेक तौ देसी लकड़ी हुवणै रै कारण आ अठै सोरै सांस मिल ज्यांवती, बीजौ ईं लकड़ी नै दीवळ नीं लागै अर तीजौ औ काट इत्तौ कंवळौ के इण माथै कोरणी रौ काम जिसौ सोरी ने फूटरौ हुवै वीं री होड कम ई लकड़ी करै। आं सगळी चीजां रा कारीगर यूं तौ ठौड़-ठौड़ लाध ज्यांवता पण आं में फत्तैपुर सेखावाटी रा कारीगर खास नांमी हा।
आज अफसोस इण बात रौ है कै ईं हलकै सूं तेजी रोहीड़ै रा गाछ नै ईं गाछ रै काठ सूं बण्योड़ी सोंवणी-सांतरी चीजां खतम हुवती जाय रह्यी है। जूना गाछ काट’र नूंवां नीं लगावण री प्रवृत्ति सूं तौ आं गाछां रौ काळ पड़तौ जाय रह्यौ है अर जूनी चीज्यां रा ब्यौपार्यां रै हाथां दूर-दिसावरां में निर्यात हुय'नै अै चीज्यां नीवड़ती जाय रह्यी है। ईं प्रवृत्ति माथै रोक री दरकार है अर समाज नै सरकार दोनां कानी सूं आं चीजां रै संरक्षण री जरूत है।