यह ताल वाद्य है। खड़ताल या करताल एक इडियोफोनिक (आत्मध्वन्य) वाद्ययंत्र है, जो दक्षिण एशिया में उपयोग किया जाता है। मांगणियार (और अब लंगा समुदाय) द्वारा उपयोग की जाने वाली खड़ताल अपनी साधारण संरचना और कम बजट के वाद्य के रूप में अद्वितीय है। यह वाद्ययंत्र चार सपाट और चिकनी लकड़ी की पट्टियों से बना होता है। प्रत्येक हाथ में इन पट्टियों का एक सेट होता है, और प्रत्येक हाथ की उंगलियाँ इन पट्टियों को एक-दूसरे से टकराती हैं। आपस में टकराने से लकड़ी की पट्टियों से जो ध्वनि निकलती है, यह ध्वनि ढोलक के साथ संगत करती है।

राजस्थान में पहले-पहल खड़ताल को प्रचलित करने का श्रेय झांफली कलां के उस्ताद सद्दीक खान मांगणियार को जाता है। ये स्वयं खड़ताल के उम्दा कलाकार थे।

खड़ताल न केवल कलाकार के साथ संगत करती है, वरन ताल-आधारित एकल प्रस्तुति के लिए भी खड़ताल एक अच्छा विकल्प है। इन ताल-आधारित प्रस्तुतियों में ढोलक और खड़ताल शामिल होते हैं; और कभी-कभी मोरचंग भी। इनमें अक्सर जुगलबंदी होती है, जो दो या तीन वाद्ययंत्रों के बीच एक संगीतमय संवाद होता है। इस संदर्भ में, जुगलबंदी एक प्रश्न-उत्तर शैली में आकार लेती है, जिसमें खड़ताल-वादक एक विशेष ताल बजाता है और ढोलक-वादक इस ताल की व्याख्या ढोलक पर करता है। इस जुगलबंदी का आरंभ धीमी गति से शुरू होता है और अंत में द्रुत ताल तक आते-आते अन्य वाद्य भी इस जुगलबंदी में साथ हो लेते हैं। इसे वादकों द्वारा आकर्षक मुद्राओं और नाटकीय देहभाषा के साथ प्रस्तुत किया जाता है।

वर्तमान में खड़ताल के अच्छे वादकों में उस्ताद गफूर खान मांगनियार, गाजी खान बरना, देवु खान, भुंगर खान और रईस खान का नाम लिया जा सकता है।

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