कामायचा एक तत् वाद्ययंत्र है, जो राजस्थान के मांगणियार समुदाय का विशिष्ट वाद्ययंत्र है। यह गज से बजाया जाता है। इस वाद्य को बनाने में लकड़ी के एकल पीस को तराशा जाता है, जो आम या शीशम की होती है, और लकड़ी के खोखले भाग को बकरी की खाल से ढका जाता है। इसका गज भी आम या शीशम की लकड़ी से बना होता है और इसे घोड़े के बालों से ताना जाता है। इस वाद्य के तीन मुख्य तार बकरी की आंत से बने होते हैं और इन्हें वादक उंगलियों से बजाता है। इसके अलावा, इसमें 12-15 सिंपैथेटिक स्ट्रिंग्स होते हैं। इन तारों को आमतौर पर उंगलियों से नहीं बजाया जाता और ये मुख्य तारों पर बजाई गई ध्वनियों के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप से कंपन करते हैं। ये सिंपैथेटिक तार भी वादक द्वारा गज से बजाए जा सकते हैं; एक कुशल वादक इन तारों से रिदम पैदा कर सकता है।
कामायचा बजाने की तकनीक दक्षिण एशिया के गज से बजने वाले वीणा वाद्यों, विशेष रूप से सारंगी के समान है। तारों को बाईं हाथ की दो उंगलियों के नाखूनों से रोका जाता है, और उंगलियाँ या तो तार के किनारे पर या पूरी तरह पीछे रखी जाती हैं, लेकिन तारपट्टिका (फिंगरबोर्ड) को छूती नहीं हैं। यह वाद्य अक्सर स्वर के साथ संगति करने के लिए उपयोग किया जाता है और इसमें ड्रोन बनाए रखने और गाए गए छंदों के बीच मधुर अंतरे बजाने के कार्य शामिल होते हैं।
परंपरागत रूप से, एक मांगणियार वादक अक्सर अपने जजमानों के लिए अकेले प्रदर्शन करता था, और अपने गाने के साथ कामायचा बजाता था। कुछ वर्ष पहले तक मांगणियार कलाकार ढोलक नहीं बजाते थे, बल्कि कामायचा वादक इस वाद्य से ही ताल बना लेते थे। ऐसे कलाकारों में चानण खान मांगणियार, हाकम खान मांगणियार, हकीम खान मांगणियार और साकर खान मांगणियार का नाम आदर से लिया जाता है।
पश्चिमी राजस्थान में कामायचा वादकों की संख्या हाल के वर्षों में तेजी से कम हुई है। 1993 में, न्युमैन और चौधरी के अनुसार, पश्चिमी राजस्थान में 247 कामायचा वादक थे, जो सभी मांगणियार थे। 2025 में यह संख्या और भी कम हो गई है। कामायचा वादकों की कमी के तीन मुख्य कारण हैं। पहला, इस वाद्य की बाज़ार में उपलब्धता नहीं है, क्योंकि इन्हें सिर्फ़ कुछ ही लोग हैं जो बनाते हैं। आर्थिक रूप से भी यह बहुत महंगा वाद्य है। युवा वादकों के पास कामायचा उपलब्ध नहीं है, इसलिए वे अन्य वाद्य यंत्र सीखते हैं। दूसरा, कामायचा को सीखना तकनीकी रूप से कठिन है और इसमें दक्ष होने में दशकों लगते हैं। इस कारण भी वादक इसे सीखने में समय और ऊर्जा नहीं लगाते। तीसरा, दर्शकों की बदली हुई रुचि है। इस कारण कलाकार सार्वजनिक प्रदर्शनों में कामायचा की जगह हारमोनियम का उपयोग करने लगे हैं।
हमीरा (जैसलमेर) गाँव के उस्ताद साकर खान मांगणियार कामायचा-वादन के लिए भारत सरकार के प्रतिष्ठित पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किए जा चुके हैं। वर्तमान में उनके पुत्र फिरोज खान और दरे खान कामायचा के गिने-चुने वादकों में से हैं।