‘गांव-गांव गोगौ अर गांव-गांव खेजड़ौ’ राजस्थानी री जगचावी कैवत है। आ कैवत इण बात री ताईद करै के इण प्रदेस रै जन-जीवण में लोकदेवता गोगाजी री कितरी मांनता है। अठै गांव-गांव गोगाजी रा थांन त्यार लाधसी, जिणां माथै माटी अर भाठै पर नागदेवता री आकति उकेर्योड़ी मिळसी।
आज जीवण रै बदळतै माहौल रै बावजूद ई राजस्थांन री लोक परंपरावां अर मानतावां सागै रूप में यूं री यूं कायम है। इणनै सांस्कतिक धरोहर के भौगोलिक प्रभाव कीं कैय दौ, पण सही बात आ के प्रदेस में घणकरा मेळा-खेळा आं लोक परंपरावां अर मांनतावां रै पांण इज भरीजै।
राजस्थांन रै लोक देवतावां में गोगोजी री ठावी ठौड़ होवण सूं अै गोग चव्हांण अर गोगा पीर रै नांम सूं ईं ओळखीजै। आंरी सेवा में हर बरस भादवा सुदी सातम रै दिन गोगामेड़ी में सांवठौ मेळौ भरीजै।
राजस्थांन रै गंगानगर जिलै री नोहर तहसील सूं करीब 39 किलोमीटर दिखणाद में गोगामेड़ी नांव रौ अेक नैनौसे'क रेल्वे टेसण है। अठै सूं अेक किलोमीटर उतराद में गोगाजी री समाधि बणी थकी है। इण ठौड़ इज औ मेळौ भरीजै। भाखरां री नहर आयां पैली गोगा मेड़ी में च्यारूंमेर बाळू रेत रा मोटा-मोटा टीबा आयोड़ा हा। उण बगत इण धरती में सरप घणा रैवता, पण आज नहर सूं सिंचाई रै कारण सगळा टीबा समतळ होयग्या है अर चौफेर हरियाळी छायोड़ी है।
इण तीरथ रै निरमांण बाबत अैड़ी जनश्रुति प्रचलित है के पुरांणै बगत में बीकानेर नरेस रै ‘बाछल’ नांम री अेक रांणी ही। इण रांणी रै पेट नीं मंडण सूं वा बारै बरसां तांईं गुरू गोरखनाथ री कठोर तपस्या करी। गोरखनाथ रांणी नै वरदांन दियौ अर रांणी रै गरभ सूं गोगाजी रौ जलम होयौ। मोट्यार होयां गोगाजी रौ ब्याव ‘मिलियर’ नांव री अेक सरूपवांन राज-किन्या साथै होयौ। गोगौजी जिण बगत आपरी रांणी नै लियां राजधांनी पाछा आवै हा, मारग में वां रै मासियात भाइयां (अरजण अर सुरजण) बदनियत सूं वां रै माथै हमलौ कर दियौ। गोगाजी वीरता साथै वां रौ सांमनौ कियौ अर दोन्यूं नै मार नांख्या। घरै पूग्यां वां री मां, वां नै इण कांम सारू घणा खारा बोल कह्या, जिणसूं गोगाजी घोड़ै समेत धरती में समायग्या।
गोगामेड़ी मे गोगौजी री संगमरमर री समाधि रै ठीक सामी अेक भाटै री देवळी आई थकी। इण देवळी में घोड़ै चढ्या गोगाजी रौ चितरांम अर असवाड़ै-पसवाड़ै चंवर ढोळता भगतां रा चितरांम उकेर्योड़ा है।
गोगामेड़ी रै मेळै में राजस्थांन रै अलावा पंजाब, दिल्ली, हरियांणा, गुजरात, मध्यप्रदेस अर हिमाचळ प्रदेस सूं लाखूं सिरधाळू भगत भेळा होवै। वै सगळा अेक सरीखा पीळा कपड़ा पैरै। मिंदर में ईं सगळां साथै अेक सरीखौ बरताव करीजै। अमीर-गरीब के ऊंच-नीच रौ कोई भेदभाव नीं बरतीजै। जादू-टोळा बणाय’र गीत गावता आवै अर केई गाजां-बाजां साथै आयनै समाधि री परकमा करै।
केई भगत लांबा-लांबा बांसड़ां में रंगीन कपड़ा घाल’र निसांण त्यार करै। वां रै किनारै बंधी रस्सियां नै पकड़’र नाचै। गोगाजी री समाधि माथै मोटी-मोटी धजावां चढै, जिकी अळगै सूं इज फरफरावती निंगै आवै। सरपदंस होयोड़ा मिनख बोलवा पेटै गोगाजी री बिसेस पूजा करे अर रातीजोगौ ई देवै।
घरां में गोगाजी री पूजा में माटी रा बण्योड़ा घोड़ा पूजीजै। राखड़ी रै मौकै राखड़ियां खोल’र गोगौजी रै चरणां धरीजै अर प्रसाद नै पूजापौ चढाईजै।
गोगामेड़ी रै च्यारूं मेर रौ छेत्र गोगाजी रौ ओरण बाजै। इण छेत्र में झाड़-बींट रै कोई घाव नीं घालै। अठै थांन री सरहद में मांचै माथै सूवणौ ई मना है। इण धरती में हाल ई सांप-परड़ोटिया मोकळा लाधै, पण मेळै रै मौकै कदैई कोई दुरघटना होई होवै—आ सुणण में नीं आई।
मेळै में आवणिया जातरू गाड़ी सूं उतरतां ई ‘वागड़ रा पीर री जै!’, ‘माता बाछळ री जै!’ अर ‘गुरू गोरखनाथ री जै!’ बोलता थका आवै। सगळा गोरखणा तळाव री पाळ माथै डेरा करै। जनजीवण में अैड़ी मांनता है के इण तळाव री माटी रौ सरपदंस माथै लेप कियां सरप रौ जैर उतर जावै। इण कारण सगळा जातरू जावती-बगत अठै री माटी आपरै साथै लेयनै जावै।
समाधि रौ दरसाव घणौ मन-मोवणौ है। सिरधाळू भगत समाधि आगै दंडौत करै जद भोपौ वां री पीठ पर सांकळ जरकावै। भगत इण चोट नै गोगाजी रौ प्रसाद मांनै। इण वास्तै जठा तांईं चोट नीं पड़ै, भगत दंडौत री हालत में सूतौ रैवै। इणरै पछै समाधि माथै आपरी हैसियत अर मांनता मुजब नारेळ, लाडू अर सोनै-चांदी रा छत्तर चढावै। केई भगत सफेद चंदण रौ चूरौ, अंतर इत्याद सुगंधित पदारथ ई चढावै।