पोदीनौ अेक विशेष पौधौ है। इण में कई इसा तत्व है जिकौ दवाईयां में काम आवै। पोदीनै रौ मूळ जनम स्थान चीन है। उठैसूं ओ जापान आयौ अर पछै दूजा देशां में पूनौ।

जळवायु : इणरी आछी पैदावार लेवण सारू जळवायु इणरै अनुकूळ होवणौ जरूरी है। आ देखण में आई है के 250 सूं 400 मीटर तांई ऊंचाई वाळा क्षेत्रां में इणरी पैदावार आछी बैठै। 14.5 सूं 18.0 वार्षिक औसत तापमान अर 110 सेंटीमीटर सालीणी विरखा वाळौ क्षेत्र इणरै वास्तै अनुकूळ है।

माटी : इण री खेती सगळी तरै री जमीन में होय सकै। आ बात जरूरी है के सिचाई री व्यवस्था ठीक होवणी चाइजै। दोमट के बाळूदोमट जमीन जिणरी पी. अेच. 6.0 सूं 7.5 होवै, पाणी रौ निकास ठीक होवै अर जैविक पदार्थ बोहळी मात्रा में होवै, उठैइणरी खेती चोखी होवै।

जुताई-बुवाई : सै सूं पैली खेत में माटी पलटण वाळै हळ सूं गेहरी जुताई कर लेवणी चाइजै अर पछै हेरौ सूं के हळ सूं फेरूं जुताई करनै पाटौ फेरनै खेत नै समतळ कर देवणौ चाइजै।

पोदीनै री बुवाई भूस्तारियै सूं करीजणी चाइजै अर बुवाईं सारू रोग रहित पौधा लेवणा चाइजै। माटीं में आछी तरियां दबायनै पौधां री कतार अर दूरी बराबर राखणी चाइजै। पहाड़ी इलाकां में पोदीनै री बुवाई मार्च-अप्रेल में दरीजै अर मैदानी इलाकै में जनवरी फरवरी में।

खाद अर सिंचाई : पोदीनै री आछी पैदावार सारू हेक्टर दीठ 120 कि.ग्रा. नवजन, 50 कि.ग्रा. फासफोरिक अम्ल अर 40 कि.ग्रा. पोटाश री जरूरत रैवै। फासफोरिक अम्ल अर पोटाश री पूरी मात्रा नै नाइट्रोजन री 1/5 मात्र बुवाई रै पैली अर छेहली जुताई री वखत देवणी चाइजै। नाईट्रोजन रौ बाकी भाग पैली लव रै 50-60 दिनां बाद देवणौ चाइजै। पैलड़ी सिंचाई बुवाई रैं सागै ई करणी ठीक रैवै। लारली सिंचाई जमीन री किस्म तापमान इत्याद माथै निर्भर करै। मानसून आयां पछै सिंचाई री जरूरत नीं रैवै।

निनाण अर कीट नियंत्रण : पोदीनै में अमुमन निनाण घणौ उगै। इण कारण बुवाई पछै दो महीनां तांई तो निनाण रौ खास ध्यांन राखणौ जरूरी। वैली लव रै बाद निनाण री जरूरत बेसी रैवै। पण पछै ई जरूरत मुजब निनाण कियां सूं फसल आछी बैठै।

पोदीनै में कई प्रकार रा कीड़ा लाग जावै। उचित वखत माथै वांरी रोकथाम जरूरी। नीं तो फसल नै घणौ नुकसाण पूगै। पोदीनै मे लागण वाळा प्रमुख कीड़ा उदैई, कळातरौ अर सफेद लट है। उदैई री रोकथाम सारू पैली बात तो खेत समतल होवणौ जरूरी है। दवाई रै रूप में 3% हेफटाफ के अेल्डर 5% पच्चीस किलो में घोळ’र जमीन में देवणौ चाइजै।

कळातरौ ई पोदीनै रा पत्ता खाय जावै। इण कारण कळातरै सूं बचाव वास्तै ठेट सूं सावधान रैवणौ चाइजै। इण सारू 5% अेल्डर 25 किळौ में घोळ’र बुवाई रै पैली खेती में देवणौ चाइजै। पछै 25 कि. हेक्टर दीठ छिड़काव करणौ चाइजै।

रोग : मूळविगलन : पोदीनै में ओ रोग सितं-अक्टू. में फैलै। इणसूं पौधै माथै धब्बा पड़ जावै। थोड़ा दिनां में धब्बा बढ’र काळा होय जावै। पछै पौधौ सूखण लागै।

लटां वाळौ रोग : ओ रोग गरमी में प्रारंभ में बेसी होवै। इणरै कारण तनै रौ ऊपरलौ हिस्सौ मुड़ जावै। उण माथै पीळा बीजाणू पैदा होवै। इणी’ज भांत पत्ता ई रोगी बण जावै। घणौ प्रकोप हुयां 50% पत्तियां खिरण लागै।

इणरी रोकथाम सारू 3% तांबायुक्त के 0.5% घुळनशीळ गंधक रै रूप में घोळ’र छिड़काव कियौ जावै। इणसूं ओ रोग मिट जावै। ओ छिड़काव 10-15 दिनां रै आंतरै सूं 1000 लीटर पाणी में दवाई घोळ’र करणौ ठीक रैवै।

कृषि अधिकारी, पाली

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : हरिश्चन्द्र जोशी ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : जनवरी 1988
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