काळ-दुकाळ राजस्थान रै सारू नवी बात कोनी। अै जुगानजुग सूं पड़ता आया अर वै विकराळ सूं विकराळ। अै काळ-दुकाळ राजस्थान रै मानखै नै तोड़ण में ईं घाटौ कोनी राख्यौ, तो कुदरत सूं अड़थड़ण री अपार खिमता दीनी।

खासकर उतरादौ-आंथूणौ राजस्थान तो काळ रौ खास मुकामं। पण अठै रा अैड़ा बेढबा हालात री वजह सूं राजस्थान रा लोगां में दो-तीनेक गुण खासतौर सूं पनप्या। अेक तो संचय करण री वृत्ति वां में आई अर दूजौ कम सू कम खरचै में आपरौ काम काढण री कळा वै सीखी। अर तीजौ कमावण नै भलांई काळी-कोसां आतरै अठै रै मिनख नै जावणौ पड़ियौ, वौ गयौ अर आपरी दोरप रा दिन हंसतै-हंसतै काढ्या। किणीं रै आगै हाथ पसारण री नीयत वौ नीं राखी।

राजस्थान में क्यूंकै काळ पड़ता रैवै, इण वास्तै मेह रौ जितरौ कोड अर हरख राजस्थान नै मानखै में है, उतरौ देश रै किणी दूजै प्रांत रै मानखै में कोनी। राजस्थान रा गीतां, कवितावां अर लोकगीतां में कोड मायौ नीं मावै। आधुनिक कवि चन्द्रसिंहजी री ‘बादळी’ तो इण मामलै में सिरमोर काव्य है। परम्परागत काव्य में अैड़ी कविता अकूंत है, जिण में बिरखा नै बुलावा है, बिरखा री मान-मनवार है, बिरखा रौ गुण-जस धाप-धाप’र गाईजियौ है।

राजस्थान में तो कहीजै के—

छळबळ कइकइ सांवरा, तो हाथां किरतार।

मारग मारग मोकळा, मेह बिना मत मार॥

आंथूणै राजस्थान में तो आठ-दस बरसां में जाय’र कोई अेकाधौ चोखौ जमानौ होवै। मिनखां रा उणियारां माथै हवा बावड़ै। बाकी देस-निकाळौ भुगतौ। गांव रा गांव खाली होय जावै। हरियाणै अर पंजाब री खेतियां अंवेरौ, दिल्ली रा सतखंडिया भवनां रा कमठा भुगतौ, फौजां में भरती होय’र नेफा-लद्दाख देखौ, के दिसावरां में बिणज-बौपार रौ मारग सोधौ।

पण आजादी पछै रा आं बरसां में खासौ फरक आयौ है। काळ आं बरसां में पड़ै अर इण साल रौ काळ तो इण बीसवै सईकै रा सबसूं करड़ा काळां में है, पण तो राजस्थान रै आम मानखै रौ हियौ उतौ हिलियोड़ौ कोनी लागै। इण रा केई कारण है। रजवाड़ां रा जमानां में नीं आवागमन रा इतरा साधन हा, नीं संचार री इत्ती सुविधावां ही के बारै सूं धान अर फूस फटोफट मंगाया जाय सकै। पण आज वे सब सुविधावां है अर लोकराज में जीवण री वजह सूं सरकार नै चिंता रैवै के लोक नै पाछौ मूंडौ बतावणौ है। इणरै अलावा देस-दिसावर में बसता अर कमाता समरथ राजस्थानियां री इतरी स्वयंसेवी संस्थावां है, जकी राजस्थान रै आम आदमी रै इण दरद नै समझै अर उण सारू खटण नै त्यार है।

राजस्थान में काळ री मार उण वगत दोवड़ी होय जावै, जद धान तो धान, चारौ-फूस नीं होवै। क्यूंकै राजस्थान रै मानखै रौ आर्थिक ढांचौ खेती सूं ज्यादा मेवेशियां माथै ढबियोड़ौ है। मिनखां नै धान नीं, मवेशियां नै चारौ नीं, अर अठै तांई के दोनां रै पीवण रौ पाणी नीं। यूं रात माथै रात पड़ै। दूबळौ अर दो असाढ वाळी बात हो जावै।

इण बरस रौ काळ तो छप्पनै रै काळ सूं भारी पड़ियौ मानीजै। पण इण रोज रै दुकाळ सूं छुटकारै सारू सरकार कई कायदै रा कदम उठाया है। काळ सूं निपटण 477 करोड़ रुपियां रा राहत काम करीजण री तेवड़ीजी है। आं में सूं घणकरा सुरू भी होयगा है। पीवण रै पाणी रै कार्यकमां माथै 147 करोड़ रुपिया खरच होसी अर मवेशियां नै बचावण सारू अर चारै रै बंदोबस्त सारू 158 करोड़ रुपिया खरचण री योजना है। आंरै अलावा चिकित्सा, असहायां री सहायता अर पोषाहार रा कार्यकमां रै अलावा खेती रै वास्तै 10 करोड़ रुपियां रौ अनुदान, 15 करोड़ रुपियां री वसूली रौ स्थगन अर 16 करोड़ रुपियां रा सहकारी कर्जा री वसूली टाळीजी है। इण बरस नवम्बर 1986 सूं जुलाई 1987 तांई कुल मिला’र 3.042 लाख मानव दिवसां रै बरोबर रोजगार दियौ जासी।

प्रांत रा सत्ताईस जिलां में सूं ईग्यारा जिला—जैसळमेर, बाड़मेर, बीकानेर, गंगानगर (कीं तहसीलां छोड़’र) चूरू, नागौर, पाली, सीकर, झुंझनू अर जालौर धाप’र रेगिस्तानी जिला है। अर सरकार खुद मानै के आं जिलां में लगैटगै काळ पड़ियोड़ौ रैवै।

अेक पुराणी कहावत मे कहीजै—

पग पूंगळ, धड़ कोटड़ै, बाहू बायड़मेर।

जोयां लाधै जोधपुर, ठावौ जैसळमेर॥

मतलब के काळ रा पग पूंगळ (बीकानेर) में, धड़ कोटड़ा (मारवाड़) में अर भुजावां बाड़मेर में है अर सोधियां जोधपुर में लाध जावै, अर जैसळमेर तो इणरौ पक्कौ ठिकाणौ है।

जीयां के म्हैं पैली कह्यौ आथूंणै राजस्थान रौ घणकरौ कारोबार ढांढा माथै ढबियोड़ौ है। थार परकर अर राठी नस्ल री गायां, सांचोर रा घोड़ा, नागौर रा बळद ख्यात नांव रह्या है। ऊंट अर लरडियां अठै धपाऊ पाळीजती आई है, पण बिरखा री कमी में आं नै पाळणा-पोखणा अबखा होय जावै। देश रै विभाजन सूं पैलां अै काळ पड़ियां सिंध री तरफ चल्या जावता, अब आं नै मध्यप्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश अर चम्बल री तरफ ले जावणा पड़ै अर वठै पशुपालकां रै जीव नै कम घांदा कोनी।

पाणी री कमी अर दूजी सगळी दैण तो उण बगत मिटसी जद राजस्थान नहर परियोजना (अबै इन्दिरा गांधी नहर) पूरी होसी। नहर जैसळमेर तांई पूगगी है। इण परियोजना री संशोधित लागत अबै पनरा सौ करोड़ रुपिया कूंतीजी है। संशोधित परियोजना रै हिसाब सूं सागरमल गोपा शाखा बाड़मेर जिलै में ठेठ गडरा रोड़ तांई हिमालय रौ पाणी ले जासी। इन्दिरा गांधी नहर परियोजना री वजह सूं आज गंगानगर अर बीकानेर जिलै री भूरी माटी मोतियां मूंघी होयगी है। अर आवण आळै बगत में अबार ‘काळौ पाणी’ कहीजण आळौ इलाकौ धान रौ भंडार होय जासी। अबार अठै आई साल ढाई सौ करोड़ रुपिया मोल रौ धान गेहूं, चावळ गन्नौ, दळहन इत्याद होवै।

इन्दिरा गांधी नहर क्षेत्र में काश्तकार जून 1987 तांई खातेदारी रै वास्तै आवदेन कर सकै। भूमि हस्तान्तरण रा मामल नियमित करावण सारू जून 1987 तांई आवेदन करियौ जाय सकै। जरूरत पड़ियां सरकार इण अवधि नै छ: महीनां तांई और बधाय सकै। सरकार अकाळ पीड़ित जिलां में पंचायत समितियां, सार्वजनिक निर्माण विभाग, सिंचाई विभाग, भूसरंक्षण अर वन विभाग इत्याद रै मारफत स्थाई महत्व रा केई निर्माण काम हाथ में लेय’र पीड़ितां नै राहत पुगावण कौ काम कियौ है। इण भांत री और केई सुविधावां सरकार आपरै बूतै परवाण देवण में लागियोड़ी है। वे सब आछी है अर आछी होवैली। अबै कीं दूजी बातां पाठकां री निजरां सामी पेश है:

काळ कोई पैलीवार तो पड़ियौ कोनी, भलांई काळ दूजा काळां सूं भारी होवै, सरकार नै केई बातां रौ ध्यान राखणौ चाइजै अेक तो लारला तजरबा बतावै के अकाळ राहत नै सीरणी समझी गई है। जे अकाळग्रस्त इलाकै रौ विधायक सत्ताधारी दळ री है अर प्रभावशाली हो तो लाखां रुपियां मंजूर कराय लिया अर आपरै इलाकै रा लोगां अर खासकर राजनीतिक मरजीदानां नै धाऊधप खवाय दिया। सड़ंकां बणी कोनीं, बेरा-तळाब खुदिया कोनी अर लाखां रुपियौ बंटगौ। आगलीवार फेर वै री वै सड़कां बणी, वै रा वै बेरा खुदिया अर पइसा गया आपरै गेलै। म्हैं तो म्हारै गांव री बात बताऊं, बस सटैण्ड सूं गांव री छेटी च्यारेक फर्लांग री है। अकाळ राहत रै तहत च्यार वार वा लिंक रोड बणी जकी मूळ सड़क सूं गांव नै जोड़ै अर हालत है के नीं उण माथै आराम सूं बळदागाडी चाल सकै। नीं पाळौ आदमी चाल सकै। डामर रौ मूंडौ तो वा देखियौ कोनीं अर कोपरिया हाल मूंडौ काढै। सो कैवण रौ मतलब है के अकाळ राहत सूं स्थाई महत्व रा काम इण तरह सूं कराया जावणा चाइजै के अेकूअेक पइसौ काम रै नतै लागै। जिणसूं लोगां नै मुफत रौ माल खावण री आदत नीं पड़ै अर छुटभय्या नेतावां रै फोगट में हवेलियां नीं चिणीज जावै। दूजौ अैड़ा कामां माथै ज्यादा अरथाऊ ढंग सूं खरच होवणौ चाइजै, जिणसूं आईन्दा अकाळ पड़ै तौ उणरी मार लोगां नै कम भुगतणी पड़ै। अर अकाळ रै साथै-साथै लोगां री प्राथमिक जरूरतां रौ उपाय निकळै। सरकार री निगैदास्ती खरचीजतै रुपियै माथै होवणी चाईजै। राजस्थान नहर रा करोड़ां रुपियां रा घोटाळा तो आज राजस्थान रौ जणौ-जणौ जाणै। जठै तांई सरकार आपरै तंत्र रौ भिस्टीवाड़ौ नीं मेटसी, आम आदमी रौ विसवास कितरौ राहत रौ नांव लेवौ, सरकार माथै नीं जमसी।

दूजौ म्हैं तो वां लोगां री सरावना ज्यादा करूं जका काळ री इण अबखी बिळिया में स्वयंसेवी संस्थावां बणाई है अर आपरा साधनां रै पाण काळ सूं लड़ण में लागियोड़ा है। ज्यूं जोधपुर री 'मारवाड़ अकाळ सहायता समिति' आपरी चेष्टावां सूं जोधपुर, भोपाळगढ़, बाड़मेर, पाली, ओसियां, बिलोड़ा, शेरगढ, जालोर, फळौदी अर जैसळमेर रा गांवड़ियां में चारा डिपौ रौ जाळ बिछाय दिया। राजस्थान गौ सेवासंघ, बीकानेर जिलां में जबरदस्त सेवा कर रैयी है। इणीं भांत बम्बई री 'राजस्थान वेलफेयर अेसोशियेसन'— जकी अकाळ सूं लड़ण वास्तै 30 लाख रुपियौ भेळौ कियौ अर जालोर, सिरोही, जैसलमेर जिलां में केई चारा केन्द्र खोलिया है। संस्थावां रा सदस्य तन, मन, धन सूं अकाळ पीड़ितां री सेवा में लाग्योड़ा है।

आं रै देखादेख राजनीतिक जीवां नै चाइजै के वै अकाळ नै मानवीय समस्या समझै, राजनीतिक समस्या नीं, अर उणसूं लड़ण सारू मांयनै मिनखपणौ राख’र सामी आवै।

इणवार राजस्थान विधानसभा रै बजट सत्र में जद मुख्यमंत्री जाणकारी दीनी के अबै ‘मरु क्षेत्रीय विकास कार्यक्रम’ रौ शत-प्रतिशत खरचौ केन्द्र सरकार देसी अर इण सारू केन्द्र सरकार सातवीं योजनां में दो अरब चवाळीस करोड़ रुपियां रौ प्रावधान राख्यौ है, जकां में सूं आवण आळा च्यार बरसां में अेक अरब अस्सी करोड़ रुपिया मिळ जासी, तो जीव सोरौ होयौ।

अठीनै अेक नहीं बात और मुंडागै आई। ‘इन्सेट-1 बी’ सूं लियोड़ा चित्रां सूं पतौ लाग्यौ के अरावली पर्वत श्रृंखला में नौ दर्रा है, जकां सूं मरुस्थल आगै बधै अर अकेली राज्य सरकार रै बूतै री बात कोनी कै इण पर्वत श्रृंखला नै हरी-भरी बणावै। इण वास्तै मुख्यमंत्री री बात 'राष्ट्रीय विकास परिषद' अर 'योजना आयोग' रै मुंडागै घणी महताऊ ही के इण काम नै भारत सरकार रै पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यकम रै तहत करायौ जावणौ चाहिजै। इण बात नै भी केन्द्र सरकार सिद्धान्त रूप सूं मान लीवी है। आगै तो पार पड़ियां भरोसौ है।

सही है के आज काळ री मार रै मुंडागै भूखां नीं मरणौ पड़ै, आपरा लुगाई-टाबर नीं बेचणा पड़ै, पण वै सब तो सामंती जुग री अर गैर आधुनिक बगत री बातां ही, आज तो है के कीकर राज अर समाज मिनख नै उणरौ मिनखपणौ लियां बिनां काळ सूं लड़ण री हिम्मत देवै—जद आपां कैय सकां आपां विकास करियौ हां अर राजस्थान रौ मानखौ लोकतंत्र में जीवै।

महला वाळा चेतज्यो, भारी देस दुकाळ।

भूखां नै हिमळासज्यौ, नींतर दे’ला बाळ॥

स्रोत
  • पोथी : माणक (पारिवारिक राजस्थानी मासिक) ,
  • सिरजक : तेजसिंह जोधा ,
  • संपादक : पदम मेहता ,
  • प्रकाशक : माणक प्रकासण ,
  • संस्करण : जून 1987
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