सुनारी गणेश्वर से 25 किलोमीटर की दूरी पर काटली नदी के दाहिने किनारे पर बसा है। यह तहसील खेतड़ी जिला झुंझुनूं का एक गाँव है। यहाँ से खुदाई में अनेक महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। इनमें प्रमुख अयस्क से लोहा बनाने की भट्टियाँ हैं। ये भारत की प्राचीनतम भट्टियाँ मानी गयी हैं। एक भट्टी धमन भट्टी है, जिसमें उपलों के द्वारा अयस्क से लोहा बनाया जाता था। इस भट्टी में धौंकनी लगाने की व्यवस्था भी थी। भट्टी के ताप को नियन्त्रित करने के साधन भी थे।

 

इन भट्टियों के अलावा लोहे के तीर व भालों के अग्र भाग भी बड़ी संख्या में प्राप्त हुए हैं। लोहे का एक कटोरा मिला है। यह अपने आप में एक अप्रतिम उदाहरण है। कृष्ण मार्जित मृद्भाण्ड भी खुदाई से प्राप्त हुए हैं तथा काली पॉलिश वाले पात्र भी मिले भी। अन्य वस्तुओं में मिट्टी तथा पत्थर के मणके, शंख की चूड़ियाँ और मृण्मूर्तियाँ मिली हैं। सुनारी के तत्कालीन वाशिन्दे चावल खाते थे और रथ के घोड़े लगाते थे। आवास साधारण थे। वैदिक आर्यों ने यह बस्ती बसायी थी। मौर्य काल के बाद शुंग और कुषाण काल से लेकर ईसा की तीसरी शती तक यह फलती-फूलती रही थी। कुषाण काल में काले रंग के मृद्भाण्ड चाक द्वारा बनाये जाते थे। यहाँ कई प्याले, शिकोरे और जल पात्र मिले है। मातृका मूर्तियाँ भी मिली हैं। एक मूण भी मिली है, जो अन्न संग्रह हेतु बनी थी। ये लोग कृषि कर्म करते थे, पर आखेट भी साथ-साथ चलता था।

स्रोत
  • पोथी : जयपुर का इतिहास एवं पुरातत्व ,
  • सिरजक : अज्ञात ,
  • प्रकाशक : राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी ,
  • संस्करण : द्वितीय संस्करण
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