चाकसू जयपुर क्षेत्र का एक प्राचीन कस्बा है, जिसके भूगर्भ में महत्त्वपूर्ण पुरातत्त्वीय सम्पदा छिपी पड़ी है। चाकसू जयपुर से लगभग 45 किलोमीटर दक्षिण में जयपुर-कोटा राष्ट्रीय राजमार्ग पर अवस्थित है। इसका प्राचीन नाम चम्पावती प्रसिद्ध है, जो प्राचीन लेखों में मिलता है। इसे चाटसू भी कहा गया है। जनश्रुति के अनुसार इसके नाम ताम्बावती और पहपावती भी हैं। यह कस्बा कई बार उजड़ कर फिर आबाद हुआं है। इसके पूर्व में ढूँढ तथा पश्चिम में बाँड़ी नदी बहती हे। इसकी प्राचीनता ईसा की छठी शती तक जाती है।
शिलालेखीय एवं साहित्यिक स्रोतों से ज्ञात होता है कि यह नगर प्राचीन काल में चम्पावती के नाम से मशहूर था। इसकी भग्न दीवारें इसकी प्राचीनता की कथा कहती हैं। ईसा की छठी शती से चाकसू गुहिल नरेशों के अधिकार में रहा। ये गुहिल मूलतः ब्राह्मण थे। इस वंश का प्रवर्तक भर्तृभट्ट था, जिसे सैनिक और ब्राह्मण शक्तियों से सम्पन्न परशुराम बताया गया है। भर्तृभट्ट ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों का कार्य करता था। उसके पश्चात् ईशानभट्ट और उपेन्द्रभट्ट राजा हुए। इनके बारे में कोई जानकारी नहीं है। अगला शासक गुहिल था, जिसके नाम पर गुहिलोत वंश चला।
गुहिल के पुत्र धनिक ने नगर में एक बावड़ी का निर्माण करवाया था। भण्डारकर इसको गुहिल पुत्र धनिक से समीकृत करते हैं, जिसकी जानकारी हर्ष घोदा शिलालेख से होती है। यह परमभट्टारक महाराजाधिराज श्री धवलपालदेव का अधीनस्थ सामन्त था।
चाकसू के पश्चात् कालीन शासक प्रतिहारों के सामन्त थे। औका के पश्चात् उसका पुत्र कृष्ण आठवीं शती ईसवीं के अन्त में शासनाधिकारी हुआ। यह वत्सराज प्रतिहार नरेश का सामन्त था। कृष्ण का उत्तराधिकारी उसका पुत्र शंकरगण था जिसने गौड कला के सेनापति को परास्त किया था और उसका राज्य अपने स्वामी को सौंप दिया था। गौड राजा धर्मपाल था एवं शंकरगण का स्वामी नागभट्ट द्वितीय था। शंकरगण का उत्तराधिकारी हर्ष हुआ जो प्रतिहार भोज का सरदार था। हर्ष ने उत्तरी राजाओं को जीतकर भोज को ऐसे घोड़े प्रदान किए थे जो सिन्धु को पार करने में दक्ष थे। इसका अर्थ यह है कि पूर्वी पंजाब को जीतने में हर्ष ने भोज की मदद की थी।
हर्ष के पश्चात् गुहिल द्वितीय शासक बना, जिसने गौड़ राजा को जीता और पूर्व के राजाओं से कर वसूल किया। इसने नारायणपाल को हराने में भोज और महेन्द्रपाल प्रतिहार को सहायता दी। आगारों में ‘श्रीगुहिल’ नाम से प्राप्त सिक्के इसी के बताए जाते हैं। इसके भट्ट नामक पुत्र हुआ जो प्रतिहार महीपाल प्रथम का समकालीन था। अपने स्वामी की ओर से उसने दक्षिण के राजा को परास्त किया। यह राजा राष्ट्रकूट नरेश इन्द्र तृतीय था। भट्ट का पुत्र बालादित्य था इसने चौहान शिवराज की पुत्री से विवाह किया। इसने अपनी पत्नी की स्मृति में मुरारी का मन्दिर बनाया।
गुहिलों के पश्चात् सम्भव है कि चाटसू पर चौहानों का अधिकार हो गया था। रणथम्भौर का राजा हम्मीर अपनी दिग्विजय के प्रसंग में चम्पा होता हुआ लौटा था। इसके पश्चात् चाकसू पर मुसलमानों का अधिकार हो गया। मालवा के खिलजी सुल्तानों का भी इस पर अधिकार रहा। गियाससाह के काल का 1481 सन् का एक लेख मन्दिर में अंकित है।
सन् 1491 में यहाँ प्रकाशचन्द के शिष्य रत्नकीर्ति ने सिद्धचक्र की स्थापना की थी। मेवाड़ के सिसौदिया महाराणा के अधिकार में भी चाकसू रहा। कुम्भा ने इस पर विजय प्राप्त की। महाराणा सांगा के समय रत्नचन्द्र सोलंकी यहाँ का शासक था। इसके बाद वीरमदेव राठौड़ के कब्जे में यह स्थान रहा। आगे चलकर मालदेव ने इस पर अधिकार कर लिया। अन्त में आमेर के राजा भारमल के अधिकार में यह रहा।
यहाँ उत्खनन में एक ही बौद्ध मूर्ति का सिर मिला है, जिससे ज्ञात होता है कि बौद्ध धर्म का कोई प्रभाव नहीं था। किसी समय शिव डूँगरी पर शिव मन्दिर स्थित था। नगर की पूर्वी भाग पर 10वीं, 11वीं शती का एक मन्दिर है। इसके दरवाजे पर नृत्यरत शिव अंकित हैं तथा मण्डप का अवशिष्ट भाग अच्छी कोरनी युक्त पाषाण स्तम्भों के सहारे टिका है। महाराजा मानसिंह आमेर के समय में इस मन्दिर पर एक नया मन्दिर बनाया गया।
शिव डूँगरी पर स्थित प्राचीन जैन मन्दिर अब शिव मन्दिर हैं। इसके दरवाजे आठवीं शती के हैं। 1575 ईसवी में भट्टारक चन्द्रकीर्ति ने इसे अपना निवास स्थान बनाया। मध्यकाल में चाकसू विद्या का बड़ा केन्द्र रहा था। इक्कर ने यहाँ कई अपभ्रंश काव्य लिखे। चाकसू के प्राचीन जैन और हिन्दू मन्दिरों का विनाश मुसलमानों ने किया। सन् 1572 में एक मुस्लिम मकबरा यहाँ बना, जिसमें मन्दिरों के अवशेष काम में लिए गए।
सन् 1871-72 में प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता जनरल कनिंघम के सहयोगी कार्लाइल ने यहाँ का सर्वेक्षण किया था। इस समय दुर्लभ पुरातत्त्वीय सामग्री प्राप्त हुई थीं। गोलेलाव तालाब की सीढ़ियों का शिलालेख इसी समय खोजा गया। इसका प्रकाशन हो चुका है। यह बालादित्य के शासनकाल का है। चाकसू में भव्य देव प्रतिमाएँ, अलंकृत पाषाण स्तम्भ, सुन्दर एवं कलात्मक तोरणद्वार मिले हैं, जो इसकी पुरातात्त्विक सम्पदा की सम्पन्नता के द्योतक हैं। दयाराम साहनी को यहाँ गुहिलराव तालाब के किनारे छः भुजाओं वाली भव्य प्रतिमा, गणेश प्रतिमा तथा बुद्ध प्रतिमा का सिर उपलब्ध हुए थे।
प्राचीनकाल में चाकसू एक सुदृढ़ परकोटे से घिरा हुआ था। जनश्रुति के अनुसार यहाँ 52 भव्य मन्दिर थे, जो बड़े कलात्मक और विशाल थे। वामनजी एवं हनुमानजी के मन्दिर आज भी विद्यमान हैं। एक शिव मन्दिर जल के भीतर आधा डूबा हुआ है। तालाब के दूसरे छोर पर एक छत्री है, जिसमें संवत् 1742 का एक शिलालेख है। यहाँ का प्राचीन सूर्य मन्दिर बड़ा प्रसिद्ध है। सात घोड़ों पर सवार सपत्नीक भगवान सूर्य की सुन्दर प्रतिमा इस मन्दिर में प्रतिष्ठित है। यहाँ सुन्दर भित्ति चित्र हैं, इनमें लंका युद्ध, भगवान विष्णु तथा 24 अवतारों के चित्र हैं। सिंहवाहिनी दुर्गा, जय-विजय, युधिष्ठिर आदि चित्रित हैं। अष्ट धातु की बनी एक प्रतिमा है, जिस पर विक्रम संवत् 1697 उत्कीर्ण है। चौथमाता मन्दिर, चतुर्भुज लक्ष्मी नारायण मन्दिर, भर्तृहरि, जगमोहनजी तथा राधाबल्लभजी के भव्य मन्दिर हैं। शिव डूँगरी इस कस्बे के पास में स्थित है। इस पर एक गढ़ी निर्मित है। यहाँ पर प्राचीन मन्दिर था। इसके प्रांगण में सुन्दर पाषाण स्तम्भ विद्यमान है। कई देवलियाँ खड़ी हैं।
चाकसू से कुछ दूरी पर ढूँढ नदी पार करने पर नन्दलालपुरा गाँव आता है। यहाँ से 1970-80 के दशक में ताम्बे से बने भारी कुछार मिले थे, जो लगभग चार हजार वर्ष पुराने थे। इनका उपयोग चट्टानों के पत्थर निकालने व तोड़ने में किया जाता होगा।