यौ तौ है संसार सविकार कछु सार नहीं,
दीसता है मेरे यार छार ज्युं असार ज्युं।
काहै लपटाय रहै काहें कुं तुं दुख सहै,
काहै भ्रंम भूलो श्रम भूला है अपारी जू।
जासु तूं कहत सुख सो तो दुख रूप आही,
माखी जैसे रही लाग मिठाई मझार जू।
काहै जिनहरख न उडि सकै धकै परी,
तकै चिहुं ओर अैसो जांणिलै संसार जूं॥