अधम करि मांन मांन कीयै व्है है हांन,

मांन मेरी सीख मांन सुख ग्राही मान रे।

मांनतें रावण राज लंका सूं गयो बेकाज,

कियो है अकाज लाज गई सब जाण रे।

दुर्योधन मान करि हारी सब धर अरि,

मांन तै गयो है मुंज चातुरी की खांणि रे।

कहै जिनहरख मांन आंण मन मै,

आंणइ तो दसारणभद्र जैसो मांन आंण रे॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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