देस समाज में सगळा गत जात’र पात री बात पगां में।
सांच रो राज हुवै चहूं ओर नपै धरती मां डगां दो डगां में।
बंधन तोड़ पढै़'र बढ़ै अनुसासन सांच समान सगां मं।
मानव-मानव प्रीत मुकेस फळै जद मानवता ई जगां में।