माया जोरिबै कुं जीव तलफत है अतीव,

देस तजि जाय परदेस परखंड जूं।

जंगली जिहाज बैठौ जल निधि मांहि पैसे,

लोभ को मरोर्‌यौ गाहै गिर पर चंम जू।

भूख सहै प्यास सहै दुर्ज्जन की त्रास सहइ,

तात मात भ्रात छोरि व्है खंड खंड जू।

अैसो लोभी लोभ कै लियै तै दुख सहै कोरि,

कहै जिनहरख जांणै है त्रिभंड जू॥

स्रोत
  • पोथी : जिनहर्ष ग्रंथावली ,
  • सिरजक : जिनहर्ष मुनि 'जसराज' ,
  • संपादक : अगरचंद नाहटा ,
  • प्रकाशक : सार्दूल राजस्थानी रिसर्च इंस्टीट्यूट, बीकानेर (राज.) ,
  • संस्करण : प्रथम
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