बालस वेस रहें सबही दिन, मान करें कछू दिन लाजें।

सेत सरोज सुं हेत धरे, अति ऊजल चीर सरीरहि छाजें।

वारिज कोस वन्यो मदन ग्रह वीरज बास विराजें।

देह लही मनमत्त निरंतर रंभा के रूप पदमणी छाजें॥

स्रोत
  • पोथी : खुमाण रासौ (छठौ खंड) ,
  • सिरजक : दलपत विजय ,
  • संपादक : ब्रजमोहन जावलिया
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