दिमाग में उपाध मचातो,
कुकरमां रो सैतान,
अर हियै में
ओजका खातो
सत करमां रौ भगवान।
मिनख नै
नचावै छै दोन्यूं
कठपुळी री दांईं
दिमाग में बैठ्यो सैतान कैवै—
अेस कर!
औगण करबा सूं कतई नीं डर
रुपिया क पाछै भाग
आपणौ ही स्वारथ साध…।
पण हिरदा म बैठ्यो भगवान
नार ज्यूं दकाळै—
झूंठी लाबद्यारी
गिरगिराट छोड
सांच अर न्याव सूं
नातो जोड़
अेक बारी तो नैचो धार
आपरा जनम-मरण न सुधार
पण, आज रो मिनख
नीं मानै हियै री हिदायत
नीं सुणै आत्मा री आहट
चालतो रेवै
घाणी रा बळद ज्यूं
सैतानी गैल।
सांची तो आ है क—
रकम अर साधन जुटाबा लेखै
भुल’र भगवान नै
दिखार्यो छै
नित नुवां
कठपुतळी रा खेल।