आजादी रो सूर, उगियो पण किरणां कठै?

छाई दुख री धूर, मिलकै काटो, मोलका।

फैली घर-घर फूट, रोटी सिकरी राज री।

राज-लोभ री लूट, माची मन में, मोलका।

चकमो घाल्या बूंट, लोक-राज री धरण पर।

लीन्यो सुख नै लूट, राज-लोभ यो, मोलका।

तिल-तिल सरकै लोग, सड़कां संकड़ी भीड़ सूं।

तनड़ो धार्‌यां भोग, भागै नगरां, मोलका।

नगर थारलो नाम, ‘मिनखां रो बाड़ो’ सही।

अकड़ घुटण छळ दाम, फूट फळपरी, मोलका।

स्रोत
  • पोथी : बिणजारो ,
  • सिरजक : उदयवीर शर्मा ,
  • संपादक : नागराज शर्मा ,
  • प्रकाशक : बिणजारो प्रकाशन पिलानी (राजस्थान) ,
  • संस्करण : अंक-17
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