आजादी रो सूर, उगियो पण किरणां कठै?
छाई दुख री धूर, मिलकै काटो, मोलका।
फैली घर-घर फूट, रोटी सिकरी राज री।
राज-लोभ री लूट, माची मन में, मोलका।
चकमो घाल्या बूंट, लोक-राज री धरण पर।
लीन्यो सुख नै लूट, राज-लोभ यो, मोलका।
तिल-तिल सरकै लोग, सड़कां संकड़ी भीड़ सूं।
तनड़ो धार्यां भोग, भागै नगरां, मोलका।
नगर थारलो नाम, ‘मिनखां रो बाड़ो’ सही।
अकड़ घुटण छळ दाम, फूट फळपरी, मोलका।