जय! खिम्या वर टोप, वचन-समिति वख्तर प्रवर।

अधिक गुणागर ओप, आतम गढ़ आराधियै॥

स्रोत
  • पोथी : आराधना (आत्म संबोध) ,
  • सिरजक : जयाचार्य ,
  • संपादक : युवाचार्य महाप्रज्ञ ,
  • प्रकाशक : जैन विश्व भारती लाडनूं
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