रामा एकै पीव बिन, मेरे दुख अपार।
सुखिया केम दुहागिणी, कहो किनके आधार॥
एक दिहाड़ा पीव बिन, मेरे अहळा जाय।
रामदास दुहागिनी, कहौ कैसे सुख थाय॥
रामदास घोड़ै चढ़ौ, बार न लाओ छिन।
वेगि मिलो निज पीव सूं, पीछै पड़सी भिन॥
घोड़ा करिये ज्ञान का, सबद-ताजणा हाथ।
लिव की करो लगामड़ी, साथे जान-बरात॥
पीठी करिये प्रीत की, प्रेम पटोळो लाय।
रामदास कर कचवौ, साड़ी सुमत औढाय॥
तत तोरण मन थंभ कर, हरि हथळेवो लाय।
रामा चंवरी अगम की, पिव सूं फेरा खाय॥
गम कर गहणो पहरियो, सजिया सब सिणगार।
नैणा काजळ नेम का, दीपक दिल दीदार॥
रामदास महला चढ्या, पिव सूं परचा होय।
अरस परस मिल खेलिया, दूजो और न कोय॥
सुरत सुहागण सुंदरी, मन राख्यो बिलमाय।
रामदास नग निरखता, प्रीतम मिलिया आय॥
प्रीतम मिलिया प्रेम सूं, पूरी मन की आस।
सुन्य सेजां में रामदास, आठूं पहौर विलास॥
पीहर मेरा परम गुरु, भाई सील संतोख।
पीव हमारा ब्रह्मा है, रामे पाया पोख॥
पिता हमारा सतगुरु, ररंकार भरतार।
सुन सेजां में रामदास, आठ पहौर हुसियार॥
पिता मांहि परणाविया, पूरबला भरतार।
अमर सुहागिन मैं भई, अमर पुरस की नार॥