गृह त्याग में गया, मन चाल्यौ गृह मांय।
रामदास धोबी कुत्तौ, भटक भटक दुख पाय॥
घर में मिल्या न घाट में, भटक न आयौ हाथ।
रामदास दोनूं गया, लह्या न ऐकौ साथ॥
गृह त्याग बन में गया, बन में भज्यौ न राम।
रामदास दोनूं गया, सर् यो न ऐकौ काम॥
गृह संझ्यौ नहीं वन संझ्यौ, लागौ वाद-विवाद।
भेख पहर भांडी करी, साईं कियौ न याद॥
भेख पहर त्यागी भया, मन तैं त्याग न होय।
रामा धूळ बगूल की, पड़ै धरण में सोय॥
अनड़ पंख आकास में, इंड पड़्यो धर आय।
रामदास यूं समझ कर, उलट आद घर आय॥
अनड पंख ज्यूं साधु है, और पंखी ज्यूं भेख।
रामा उदर कारणै, करै साधु सूं धेख॥
माला कंठी तिलक-धर, हुय बैठा निज सत।
रामा स्वारथ कारणै, भूल गया निज तत॥
सांग पहर साधु हुआ, भगति न आई हाथ।
रामा स्वारथ कारणै, चल्या जगत की साथ॥
जगत भली है रामदास, चाल कुल की लाज।
भेख पहर भांडी करी, सर्यो न ऐकौ काज॥
त्याग कियौ भसमी घसी बैठो बन के माहिं।
रामा आसा जगत की राम जाणियो नाहिं॥
भेख सब ही कर रामदास कर जगत की आस।
साधू रत्ता राम सूं मिल निरंजण पास॥
के लोभी के लालची कामी क्रोधी होय।
रामदास संसार मैं हरिजन बिरला जोय॥
जिण घर भूल्या रामजी, जहां रहणौ मुसकल्ल।
काम क्रोध बहु ऊपज, दुख-सुख बहुसी मल्ल॥
ऐते दुख में रामदास सिंवर सिरजणहार।
सो साधूजन जानियै, तीनलोक ततसार॥
चंदन ज्हां त्हां रामदास वन में देख्या माहिं।
सूरां सबही फौज मैं, कोइक विरला थाय॥