रामदास दरियाव मैं, अगनी लागी जोय।

हीर रतन सबही वळै, ऐसा अचरज जोय॥

अगन बादळी रामदास, बध कीनौ विस्तार।

झाळ देख दुखिया भया, दाझत है संसार॥

कै दुखिया धन कारणै, कै तिरिया काज।

मात पिता परिवार कूं, कै कुल करनी लाज॥

दुखिया सब संसार है, चहै देह का स्वाद।

रामदास दुखिया सबै, कर-कर वाद विवाद॥

रामदास हरि नाम बिन, सुखी दीसै कोय।

सुखिया सोई जानियै, राम निजर भर जोय॥

रामदास संसार कूं, झुर अरु करूं विचार।

मोकूं कोइ झुरही, वाही की लार॥

मोकूं झूरै रामदास, राम रटैगा सोय।

रामसनेही बाहिरौ, और झूरै कोय॥

स्रोत
  • पोथी : श्री रामदास जी की बाणी ,
  • सिरजक : रामदास जी ,
  • संपादक : रामप्रसाद दाधीच 'प्रसाद', हरिदास शास्त्री ,
  • प्रकाशक : श्रीमदाद्य रामस्नेही साहित्य शोध - प्रतिष्ठान, प्रधान पीठ, खेड़ापा, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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