रामदास हीरो मिल्यौ, अपारखू के हाथ।

कबड़ी बदळै यूं गयौ, कबड़ी चली साथ॥

हीरा को कछु घट्यौ, बूड़ौ पसू गिंवार।

रामदास खाली रह्या, कबड़ी का व्यौपार॥

रामदास हंसा उड्या, बैठा छीलर तीर।

अनजाणा पानै पड़्यौ, बुगलौ कहै सरीर॥

रामा सबै अपारखू, हंस बुगला ठहराय।

हीर अमोलख परख बिन, धाणी साटै जाय॥

हंस उड्या महराण सूं, बुगला कै घर जाय।

बुगलो मन में गरबियौ, बैठो पांख फुलाय॥

बुगला हंस सूं प्रीत कर, मन की गुरड़ी छोड़।

जहं बैठा सोभा वधै, जाकी कैसी होड़॥

पद्दारथ कूं बेच कर, कंकर बदळै लेह।

हंसा की संगत तजी, कर बुगला सूं नेह॥

रामदास बाजार में, एक देखिया ख्याल।

कबड़ी बदळै हीर कूं, देकर चल्या दलाल॥

रामदास मन परखिया, सब ही मोल बिकाय।

सबद अमोलख ब्रह्मा है, घट-घट रह्या समाय॥

स्रोत
  • पोथी : श्री रामदास जी की बाणी ,
  • सिरजक : रामदास जी ,
  • संपादक : रामप्रसाद दाधीच 'प्रसाद', हरिदास शास्त्री ,
  • प्रकाशक : श्रीमदाद्य रामस्नेही साहित्य शोध - प्रतिष्ठान, प्रधान पीठ, खेड़ापा, जोधपुर ,
  • संस्करण : प्रथम
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