पांचू उलटा रामदास, मन एके घर आण।
सुरत न खड़ै सबद सूं, लिव लागी जब जाण॥
लिव लागी जब जाणिये, आठूं पहोर अभंग।
कबूं न छांडे रामदास, सुरत सबद का संग॥
सुरत उडाणी गिगन कूं, मिली सून्य में जाय।
भाव जागिया रामदास, परभावे लिव लाय॥
रामदास लिव जहं लगी, जहं निरंजण निरंकार।
स्वामी सेवक एक हुय, अरस-परस दीदार॥
नर सुर नाग न संचरै, मुनिजन सके न जाय।
मन-पवना पहुंचे नहीं, ता घर में लिव लाय॥
अधर देस लिव अधर में, अधर रहे लिव लाय।
रामदास मिल अधर में, सुर नर सकै न जाय॥
रामदास देही परे, मिल्या विदेह में जाय।
जहं रंकार रसना बिना, सहज रहे लिव लाय॥