उज्जळ नीर अकास का, पड़्या धरण में आय।
मैली सूं मिल बीगड़्या, यूंहि कुसंगत थाय॥
बूंद एक ही रामदास, फांट हुई तिहुं भाग।
क्युं कदळी क्युं सीप में, क्युं सरपै मुख लाग॥
सरपां के मुख जहर हुय, सीपां मोती थाय।
रामदास कदळी पड़ी, सोहि कपूर निपाय॥
रामदास विचार कर, यूंहि कुसंग कहाय।
सरप जहर ज्यूं नीपना, काल गिरा सै आय॥
कुसंगत केता गया, जाका अंत न पार।
रामा नागर वेलि ज्यूं, निरफळ रह्या गिंवार॥
खल की संगत रामदास, निरफळ नागर बेलि।
केता नर यूं ही रह्या, कर कुसंग कूं बेलि॥
बोर केल भेळी हुई, बध कीनौ विस्तार।
रामदास हाल्यां पछै, पान सरब ही फार॥
बौर केल के सेवणै, यूंहि कुसंगत होय।
रामदास संगत किया, आपौ बैठा खोय॥
कुसंगत सूं प्रीत कर, केता जाय विलाय।
ज्यूं दीपक संग रामदास, पड़ै पतंग विलाय॥
कुसंग मैं भी हुता करता करम अपार।
जन रामा सतगुरु मिल्या, तात लह्या विचार॥